नई दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है कि आपका घर का सीमेंट का फर्श या प्लास्टिक का सामान बनाने में कितना साफ पानी लगता है? एक ताजा वैज्ञानिक अध्ययन ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि पिछले 25 सालों में स्टील, सीमेंट, कागज, प्लास्टिक और रबर जैसे बुनियादी सामानों के उत्पादन ने मीठे पानी की खपत को दोगुना कर दिया है। यह ‘वाटर फुटप्रिंट’ अब वैश्विक जल संसाधनों पर भारी बोझ बन रहा है, खासकर उन देशों के लिए जो पहले से ही सूखे और कमी से जूझ रहे हैं। नेचर सस्टेनेबिलिटी जर्नल में छपी इस रिपोर्ट ने नीति-निर्माताओं को जगाने की कोशिश की है, वरना आने वाले दशकों में जल युद्ध की आशंका बढ़ सकती है।
मानव युग की छिपी कीमत: उद्योगों की प्यास क्यों बढ़ रही?
हम एंथ्रोपोसीन नामक इस दौर में हैं, जहां इंसानी तरक्की ने नदियां सूखा दी हैं और भूजल को चूस लिया है। ‘ब्लू वाटर’ यानी सतह का साफ पानी मुख्य रूप से कृषि पर खर्च होता है, लेकिन अब उद्योग तेजी से इसमें कूद पड़े हैं। खासकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में, जहां शहरीकरण और निर्माण बूम चल रहा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि स्टील जैसे भारी उद्योगों में पानी का ‘वर्चुअल’ उपयोग यानी उत्पादन के दौरान छिपा खर्च अभी तक अनदेखा रहा। यह स्टडी 164 देशों के 16 प्रमुख सामग्रियों पर केंद्रित है, जो बताती है कि कैसे ये रोजमर्रा की जरूरतें जल संकट को गहरा रही हैं। पहले फसलों और चारे पर फोकस था, लेकिन अब वक्त है कि इन औद्योगिक ‘पानी चोरों’ पर नजर डाली जाए।
आंकड़ों की मार: 25 सालों में दोगुनी छलांग
1995 में जहां इन सामग्रियों का कुल वाटर फुटप्रिंट 2,510 करोड़ क्यूबिक मीटर था, वहीं 2021 तक यह 5,070 करोड़ क्यूबिक मीटर पर पहुंच गया पूरी तरह दोगुना। वैश्विक मीठे पानी की कुल खपत में इनका हिस्सा 2.8% से उछलकर 4.7% हो गया। स्टील ने सबसे ज्यादा लूट मचाई, 2021 में 40% हिस्सा हथिया लिया। उसके पीछे कागज (18%) और प्लास्टिक (9%)। एल्यूमिनियम और सीमेंट भी तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन अभी इनकी हिस्सेदारी कम है। सबसे ज्यादा चिंता की बात पूर्वी एशिया, दक्षिण एशिया और ओशिनिया की। यहां 267% की वृद्धि हुई, जहां आबादी का दबाव पहले से ही चरम पर है।
क्षेत्रीय चित्र: अमीर देश बचत कर रहे, गरीब बोझ तले दबे
अध्ययन की प्रमुख लेखिका डॉ. असाफ कहती हैं, सामग्री उत्पादन बढ़ रहा है क्योंकि आबादी फूल रही है और शहर फैल रहे हैं। लेकिन पानी सीमित है। हमें उद्योग को जल-कुशल बनाना होगा, वरना संकट वाले इलाकों में हालात बेकाबू हो जाएंगे। ओईसीडी जैसे विकसित देशों ने 11% कमी हासिल की, लेकिन एशिया-ओशिनिया ने दुनिया की दो-तिहाई खपत संभाली। भारत जैसे हॉटस्पॉट्स में यह आंकड़ा और डरावना है, जहां औद्योगिक विकास जल भंडारों को नुकसान पहुंचा रहा।
यह भी पढ़ेंः विश्व एड्स दिवस: मां-बच्चे में संक्रमण अब न्यूनतम
2050 का डरावना पूर्वानुमान: नौ गुना दबाव
अगर यही सिलसिला चला, तो 2050 तक वाटर फुटप्रिंट 179% और फूल सकता है, कुल खपत में हिस्सा 9% तक पहुंच जाएगा। शोधकर्ता चेताते हैं कि प्लास्टिक, सीमेंट और स्टील जैसे सामान आधुनिक जीवन की रीढ़ हैं, लेकिन इनकी प्यास बुझाने के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे। सरकारें सब्सिडी देकर रिसाइक्लिंग को बढ़ावा दें, उद्योग पानी रीसर्कुलेट करने वाली तकनीक अपनाएं। भारत, कजाखस्तान और तुर्की जैसे देशों में तुरंत सुधार से वैश्विक संघर्ष कम हो सकता है।
क्या करें? सतत विकास की राहें
- दक्षता बढ़ाएं: उत्पादन में पानी बचाने वाली मशीनें लगाएं।
- नीतियां सख्त करें: कर छूट देकर ग्रीन टेक्नोलॉजी को प्रोत्साहन।
- जागरूकता फैलाएं: उपभोक्ता रिसाइकल्ड सामान चुनें।
- शोध को फंड: वर्चुअल वाटर पर ज्यादा अध्ययन।
यह स्टडी न सिर्फ पर्यावरणविदों के लिए, बल्कि हर उस शख्स के लिए वेक-अप कॉल है जो ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ की बात करता है। जल संकट को हल्के में न लें विकास की रफ्तार को पानी की गति से जोड़ना ही एकमात्र रास्ता है।



