नई दिल्ली: बिहार की सियासी धरती पर एक बार फिर नीतीश कुमार का जलवा छा गया। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 243 सीटों वाली विधानसभा में शानदार बहुमत हासिल कर लिया, जिसमें भाजपा को 89 और जदयू को 85 सीटें मिलीं। लेकिन इस जीत का असली हीरो कौन? वो करोड़ों महिलाएं, जिन्होंने मतदान के जरिए नीतीश सरकार को ‘पक्का’ समर्थन दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री की महिला-उन्मुख योजनाओं ने न सिर्फ वोटर टर्नआउट बढ़ाया, बल्कि एनडीए को महागठबंधन पर भारी पड़ने में अहम भूमिका निभाई।
महिला वोट का जलजला: आंकड़े बयां कर रहे कहानी
बिहार में कुल 7 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं में महिलाओं की तादाद करीब 3.5 करोड़ है, जो कुल वोटरों का लगभग आधा हिस्सा बनाती हैं। इस बार के चुनाव में महिलाओं ने पुरुषों से 8.8 प्रतिशत ज्यादा उत्साह दिखाया। कुल टर्नआउट 66.91 प्रतिशत रहा, जो 1951 के बाद का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। चुनाव आयोग के मुताबिक, 2020 की तुलना में इस बार 4.4 करोड़ से अधिक महिलाएं बूथ तक पहुंचीं, जो एनडीए की जीत का बड़ा राज है।
पिछले चुनावों का पैटर्न
- 2020 विधानसभा: महिलाओं का टर्नआउट 59.7%, पुरुषों का 54.7%।
- 2019 लोकसभा: महिलाएं 59.58%, पुरुष 54.45%।
- 2015 विधानसभा: 60.5% महिलाएं बनाम 53.3% पुरुष।
- 2014 लोकसभा: 57.66% महिलाएं, 55.08% पुरुष।
- 2010 विधानसभा: 59.6% महिलाएं, 54.9% पुरुष।
ये आंकड़े बताते हैं कि नीतीश की नीतियां धीरे-धीरे महिलाओं को सशक्त बना रही हैं, और वो अब चुनावी समीकरण बदलने वाली ताकत बन चुकी हैं। खासकर कोसी-मिथिला जैसे बाढ़ प्रभावित इलाकों में, जहां 167 सीटों पर महिलाओं का वोट पुरुषों से ज्यादा पड़ा, वहां एनडीए ने क्लीन स्वीप किया।
‘दस हजारी’ का जादू: सीधी नकद मदद ने जीता दिल
सबसे चर्चित रही तो ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत 10,000 रुपये की सीधी ट्रांसफर। राज्य की 2.77 करोड़ महिलाओं को इसका लाभ मिला, जिसमें हर परिवार से एक महिला को चुना गया। शर्तें आसान: न आवेदिका और न उसके पति आयकर भरते हों। ज्यादातर ग्रामीण और गरीब महिलाएं इससे जुड़ीं, जो दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। एक ग्रामीण कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ये पैसे महिलाओं के लिए वरदान साबित हुए। पहले कभी इतनी बड़ी रकम सीधे खाते में नहीं आई। ये चुनाव से पहले का ‘बूस्टर डोज’ था, जिसने नीतीश को ‘महिला मसीहा’ बना दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस योजना को लॉन्च किया था, और तीसरे चरण में 21 लाख महिलाओं को 10,000-10,000 रुपये ट्रांसफर हुए।
सिर्फ नकद नहीं, समग्र सशक्तिकरण की मिसाल
नीतीश कुमार का 2005 से चला आ रहा ‘महिला फर्स्ट’ एजेंडा सिर्फ एक योजना तक सीमित नहीं। उनके कार्यकाल में शुरू हुईं ये पहलें महिलाओं को वोटर से आगे ‘सिपाही’ बना चुकी हैं:
- मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना: स्कूली लड़कियों को मुफ्त साइकिलें, जिससे ड्रॉपआउट रेट घटी और नामांकन बढ़ा।
- कन्या उत्थान योजना: लड़कियों की शिक्षा के लिए मासिक स्टाइपेंड, जिससे हायर एजुकेशन में महिला भागीदारी दोगुनी हुई।
- 50% पंचायत आरक्षण: स्थानीय स्तर पर महिलाओं को सत्ता का स्वाद चखाया, जिससे ग्रामीण नेतृत्व में बदलाव आया।
- 35% सरकारी नौकरियां आरक्षण: राज्य की सभी भर्तियों में महिलाओं को प्राथमिकता, जो आर्थिक स्वावलंबन का बड़ा कदम।
- जीविका कार्यक्रम: 1.4 करोड़ से ज्यादा ‘दीदियों’ को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा, विश्व बैंक की मदद से शुरू। ये महिलाएं अब गांव की अर्थव्यवस्था का बैकबोन हैं।
- पूर्ण शराबबंदी: महिलाओं की मांग पर 2016 में लागू, जिससे घरेलू हिंसा में 30-40% कमी आई, जैसा सरकारी सर्वे बताते हैं।
जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, नीतीश ने महिलाओं को सिर्फ वोटर नहीं, पार्टनर बनाया। ये योजनाएं जाति-धर्म से ऊपर उठकर काम कर रही हैं। अध्ययनों से भी साबित होता है कि 2020 में ही इन नीतियों ने एनडीए को फायदा पहुंचाया था।
आगे की राह: महिला वोट का नया दौर
इस जीत से साफ है कि बिहार में ‘महिला वेव’ अब स्थायी हो चुकी है। विपक्षी महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस) को 25-6 सीटें ही मिलीं, जबकि प्रशांत किशोर की जन सुराज जैसी नई ताकतें भी फिसड्डी रहीं। नीतीश की ‘फीनिक्स’ वापसी ने साबित कर दिया कि कल्याणकारी राजनीति ही असली गेम-चेंजर है। लेकिन सवाल ये कि क्या ये योजनाएं सिर्फ चुनावी हथियार रहेंगी, या महिलाओं का सच्चा उत्थान करेंगी? आने वाले दिनों में इसका जवाब मिलेगा।



