नई दिल्ली: बचपन का वो मासूम दौर, जहां सिर्फ खेल-कूद और हंसी-खुशी होनी चाहिए, अब दिल की बीमारियों की दहलीज पर खड़ा है। एक ताजा वैश्विक रिसर्च ने खुलासा किया है कि पिछले दो दशकों में बच्चों और किशोरों में उच्च रक्तचाप के केस लगभग दोगुने हो चुके हैं। 2000 में जहां सिर्फ 3.2 प्रतिशत बच्चे इस जाल में फंसे थे, वहीं 2020 तक यह संख्या 6.2 प्रतिशत को छू गई।
नतीजा? दुनिया भर में 19 साल से कम उम्र के 11.4 करोड़ नौनिहाल इस चुपके से फैलते खतरे से जूझ रहे हैं। ‘द लैंसेट चाइल्ड एंड एडोलसेंट हेल्थ’ जर्नल में छपी इस स्टडी ने चेतावनी दी है कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में हृदय रोग और किडनी फेलियर जैसी गंभीर परेशानियां बच्चों की जिंदगी बर्बाद कर देंगी। सबसे डरावना तथ्य? करीब 9.2 प्रतिशत बच्चों में ‘मास्क्ड हाइपरटेंशन’ का बोलबाला है, जो सामान्य चेकअप में तो छिपा रहता है, लेकिन असल में घातक साबित हो सकता है।
मोटापा: उच्च बीपी का सबसे बड़ा विलेन, 8 गुना ज्यादा रिस्क
रिसर्च ने साफ कर दिया है कि बचपन का मोटापा इस महामारी का मास्टरमाइंड है। आंकड़ों से झलकता है कि ओबेसिटी से जूझ रहे 19 प्रतिशत बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर की पकड़ मजबूत है, जबकि सामान्य वजन वाले नौनिहालों में यह आंकड़ा महज 2.4 प्रतिशत पर ठहरा। यानी, मोटे बच्चों में खतरा आठ गुना ज्यादा है। विशेषज्ञों का कहना है कि फास्ट फूड, स्क्रीन टाइम और कम शारीरिक गतिविधि ने इस ट्रेंड को हवा दी है। लड़कियों में 2000 के 3 प्रतिशत से बढ़कर 2020 में 5.8 प्रतिशत, और लड़कों में 3.4 से 6.5 प्रतिशत हो गया।
प्री-हाइपरटेंशन का बढ़ता साया: किशोरों पर सबसे ज्यादा असर
स्टडी में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि 8.2 प्रतिशत बच्चे प्री-हाइपरटेंशन की गिरफ्त में हैं, जो उच्च रक्तचाप की शुरुआती सीढ़ी है। यह स्टेज-1 हाइपरटेंशन के नाम से जाना जाता है, जहां बीपी सामान्य से ऊपर तो है, लेकिन पूर्ण हाई बीपी का स्तर नहीं छुआ। किशोरों में यह दर 11.8 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि छोटे बच्चों में 7 प्रतिशत। खास बात, 14 साल की उम्र के आसपास बीपी में सबसे तेज उछाल आता है, और यह खासकर लड़कों में ज्यादा नजर आया। डॉक्टर मानते हैं कि अगर यहीं रोकथाम न हुई, तो यह आसानी से फुल-ब्लाउन हाइपरटेंशन में बदल सकता है।
जांच का फंदा: क्लिनिक चेकअप ही काफी नहीं, घरेलू मॉनिटरिंग जरूरी
सिर्फ डॉक्टर के पास जाकर बीपी नापना अब पुरानी कहानी है। रिसर्च में पाया गया कि क्लिनिक में तीन बार चेक करने पर हाई बीपी 4.3 प्रतिशत दिखा, लेकिन घरेलू या 24 घंटे की एम्बुलेटरी मॉनिटरिंग जोड़ने पर यह 6.7 प्रतिशत हो गया। 5.2 प्रतिशत बच्चों में ‘व्हाइट कोट हाइपरटेंशन’ मिला, जहां घबराहट से बीपी ऊंचा चढ़ जाता है। स्टडी के लीड रिसर्चर प्रोफेसर इगोर रुडान ने कहा, दो दशकों में बच्चों में हाई बीपी का दोगुना होना वैश्विक स्वास्थ्य के लिए रेड अलर्ट है। सही जांच से हम भविष्य की आपदाओं को टाल सकते हैं। वहीं, चीन के झेजियांग यूनिवर्सिटी की डॉ. पेज सॉन्ग ने जोर दिया, बच्चों में यह समस्या अब आम हो चुकी है। घरेलू मॉनिटरिंग बढ़ाएं, ताकि लाखों बच्चे अनदेखे न रहें। बचपन में कंट्रोल हो, तो वयस्कावस्था सुरक्षित रहेगी।
आगे का प्लान: जागरूकता, लाइफस्टाइल चेंज और पॉलिसी ओवरहॉल
विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि हेल्थ सिस्टम को बच्चों के लिए बीपी चेकअप को रूटीन बनाना होगा। घरेलू डिवाइस और 24-घंटे ट्रैकिंग को सुलभ करें। परिवारों को मोटापा कंट्रोल, रेगुलर एक्सरसाइज और हेल्दी डाइट पर फोकस करने को कहें। नीति स्तर पर स्कूलों में स्क्रीनिंग कैंप लगाएं। WHO की ‘ग्लोबल रिपोर्ट ऑन हाइपरटेंशन 2025’ के अनुसार, दुनिया में 1.4 अरब लोग हाई बीपी से लड़ रहे हैं, वैश्विक आबादी का 34 प्रतिशत। भारत में 21 करोड़ वयस्क प्रभावित, जिनमें 17 करोड़ का बीपी अनकंट्रोल्ड। सिर्फ 39 प्रतिशत को पता है कि वे बीमार हैं, और महज 17 प्रतिशत में ही कंट्रोल है। बच्चों का यह ट्रेंड देश के लिए और बड़ा संकट खड़ा कर सकता है।



