पटना। पहले भाजपा के प्रदेश स्तरीय बड़े नेताओं पर बड़े-बड़े भ्रष्टाचार का आरोप लगाना। अब सीधे अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बूथ का उम्मीदवार बता देना। इसके बावजूद भाजपा द्वारा पीके के बारे में मौन रहना, यह भी चुनावी रणनीति का एक हिस्सा है, जो पी.के. की घबराहट को बढ़ा रहा है।
राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर ने चुनाव की अधिसूचना से पूर्व भाजपा के कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इससे भाजपा को मौन होना पड़ा था। बाद में भाजपा नेताओं ने इसका जवाब दिया। इससे पी.के. ने मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरी और अपनी ईमानदार छवि को बनाने की कोशिश की, लेकिन उसके बाद उन पर कुछ आरोपों का दौर शुरू हुआ।
पीके का धुआंधार प्रचार
पटना में पोस्टर के माध्यम से आरोप लगे। टिकट बंटवारे में भी आरोप लगे। इसके बाद पी.के. ने भी धुआंधार प्रचार शुरू किया, लेकिन दूसरे बड़े दलों ने उनका नाम लेना बंद कर दिया। इससे मीडिया में सुर्खियां बटोरने वाले पी.के. अब नई रणनीति बना सकते हैं।
अमित शाह को बताया उम्मीदवार लूटने वाला
पश्चिमी चंपारण में शुक्रवार को एक जनसभा के दौरान ‘जन सुराज’ सुप्रीमो प्रशांत किशोर ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि “बिहार में पहले बूथ लुटता था। लेकिन अब अमित शाह ने उम्मीदवार लूटने का नया काम शुरू किया है।” उन्होंने दावा किया, “हमारे 3-4 उम्मीदवार लूटे तो आज गोपालगंज में एक सूद समेत वापस कर दिए हैं। बाकी का हिसाब बिहार की जनता करेगी।”
उन्होंने आगे कहा कि “ये गुजराती लोग दिल्ली में बैठकर बिहार का भविष्य तय कर रहे हैं। ताकि बिहार मजदूरों की फैक्ट्री बनी रहे। बिहार के बच्चे जाएं मजदूरी करने और गुजरात के लोग फैक्ट्री के मालिक बने रहें।”
भाजपा नहीं नाम लेना चाहती प्रशांत का
प्रशांत किशोर के इन बयानों के बावजूद भाजपा नेता उनका उत्तर नहीं दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भाजपा यदि जवाब देती है तो प्रशांत किशोर को और सुर्खियां बटोरने में सुविधा होगी। इस कारण किसी भी छोटी पार्टी का नाम लेना उसको बढ़ावा देने के समान होता है। यह मानकर भाजपा प्रशांत किशोर की नई पार्टी का नाम लेना नहीं चाहती।
PM ने जन सुराज का नहीं लिया नाम
यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी समस्तीपुर की चुनावी सभा के दौरान राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस पर लगातार हमले किए, लेकिन जन सुराज का एक बार भी नाम नहीं लिया। उन्होंने ‘लठबंधन’ से लेकर ‘जंगलराज’ तक का उल्लेख किया। कांग्रेस के शासनकाल में बिहार के लिए फंड आवंटन के दौरान हुए भेदभाव का उल्लेख किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशांत किशोर के बारे में चुप्पी को राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि अपने इस स्टैंड से वह बिहार की राजनीति को एक नई दिशा दे रहे हैं। वे चुनाव को एनडीए और महागठबंधन के बीच की आमने-सामने की लड़ाई के रूप में पेश करना चाह रहे हैं। किसी थर्ड प्लेयर की उपस्थिति से मामला उलझ सकता है, जो दोनों ही गठबंधन के लिए खतरनाक हो सकता है।
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खुद को तीसरी शक्ति बता रहे प्रशांत
वर्तमान में प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी खुद को इस चुनाव की तीसरी शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। हालांकि अपनी सभा में प्रशांत किशोर का दावा है कि वह अपार सफलता के साथ अपनी सरकार बनाएंगे, लेकिन धरातल पर उनकी स्थिति को देखते हुए यह माना जा रहा है कि कई क्षेत्रों में जनसुराज की उपस्थिति से मुकाबला रोचक और नजदीकी हो सकता है। बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के बाद सबसे पहले प्रशांत किशोर ने ही अपनी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची जारी की थी। उसके बाद से वे लगातार अपने प्रत्याशियों के समर्थन में चुनाव प्रचार कर रहे हैं।



