IUCN: भारतीय भेड़िया को मिल सकती है नई प्रजाति की पहचान

IUCN रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत और पाकिस्तान में कुल मिलाकर 2,877 से 3,310 के बीच भारतीय भेड़िए बचे हैं। इतनी कम आबादी की वजह से इसे 'वल्नरेबल' कैटेगरी में डाला गया है, यानी विलुप्ति के कगार पर।

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नई दिल्ली: अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ यानी IUCN ने हाल ही में भारतीय उपमहाद्वीप के भेड़ियों पर एक खास अध्ययन किया है। इस अध्ययन में ‘कैनिस ल्यूपस पैलिप्स’ नाम के इस भेड़िए को अलग से जांचा गया, और सिफारिश की गई है कि इसे भेड़ियों की एक स्वतंत्र प्रजाति माना जाए। अगर यह सिफारिश मंजूर हो गई, तो यह कैनिस परिवार की आठवीं आधिकारिक सदस्य बन जाएगी, जो वन्यजीव संरक्षण के लिए एक ऐतिहासिक कदम होगा।

भारतीय भेड़िया की खासियतें क्या हैं?

यह भेड़िया, जिसे अक्सर इंडियन ग्रे वुल्फ कहा जाता है, मुख्य रूप से भारत और पाकिस्तान के इलाकों में पाया जाता है। रेगिस्तानों, सूखी घास वाली भूमि और विरल जंगलों में यह अपना घर बनाता है। आकार में यह दुनिया के दूसरे भेड़ियों से थोड़ा छोटा होता है, और इसकी फर हल्के भूरे रंग की होती है जो इसे गर्म मौसम में छिपने में मदद करती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रजाति बेहद पुरानी है, मानव सभ्यता से भी पहले की, और भारतीय क्षेत्र की जैव विविधता का एक अनमोल हिस्सा है।

IUCN रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत और पाकिस्तान में कुल मिलाकर 2,877 से 3,310 के बीच भारतीय भेड़िए बचे हैं। इतनी कम आबादी की वजह से इसे ‘वल्नरेबल’ कैटेगरी में डाला गया है, यानी विलुप्ति के कगार पर। चिंता की बात यह है कि जहां बाघों जैसी अन्य बड़ी प्रजातियों की संख्या अब स्थिर होने लगी है, वहीं भारतीय भेड़िए की गिनती लगातार कम हो रही है। वजह? ये ज्यादातर संरक्षित पार्कों से बाहर, आम इलाकों में रहते हैं जहां इंसानी हस्तक्षेप ज्यादा है।

संरक्षण की चुनौतियां

सिर्फ 12.4 प्रतिशत भेड़िए ही ऐसे क्षेत्रों में हैं जहां सरकारी सुरक्षा है। बाकी 87 प्रतिशत से ज्यादा खुले मैदानों में घूमते हैं, जहां शिकार, जमीन का अतिक्रमण, सड़कों का विस्तार और इंसान-जानवर टकराव जैसी समस्याएं उन्हें मार रही हैं। देहरादून के वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों के मुताबिक, बाघों का संरक्षण सफल हो रहा है क्योंकि वे मुख्य रूप से रिजर्व में हैं, लेकिन भेड़िए बाहर हैं और दबाव झेल रहे हैं। रिपोर्ट साफ कहती है कि अलग प्रजाति का दर्जा मिलने से संरक्षण की नई योजनाएं बन सकती हैं।

कैनिस परिवार की मौजूदा सदस्य

अभी कैनिस जीनस में सात प्रजातियां हैं:

  • कैनिस ल्यूपस: ग्रे वुल्फ
  • कैनिस लैट्रांस: कोयोट
  • कैनिस ऑरियस: गोल्डन जैकल
  • कैनिस सिमेंसिस: इथियोपियन वुल्फ
  • कैनिस फैमिलिएरिस: घरेलू कुत्ता
  • कैनिस रूफस: रेड वुल्फ
  • कैनिस लूपास्टर: अफ्रीकी वुल्फ

अगर भारतीय भेड़िया जुड़ता है, तो यह सूची और मजबूत होगी।

आगे का रास्ता और खतरे

रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगले दस सालों में हालात और बिगड़ सकते हैं। उत्तर प्रदेश जैसी जगहों पर हाल के इंसान-भेड़िया झगड़ों से साफ है कि बिना तुरंत कदम उठाए स्थिति हाथ से निकल सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि समस्या वाले भेड़ियों को सावधानी से हटाया जाए ताकि लोकल कम्युनिटी का भरोसा बना रहे और संरक्षण अभियान चल सके। यह भेड़िया सिर्फ भारत और पाकिस्तान तक सीमित है, और इसकी प्राचीन जड़ें इसे खास बनाती हैं। अब वक्त है कि सरकारें और समाज मिलकर इसे बचाएं, वरना यह अनोखी प्रजाति इतिहास बन जाएगी। संरक्षण विशेषज्ञों का कहना है कि अलग प्रजाति का स्टेटस मिलने से फंडिंग और जागरूकता बढ़ेगी, जो इसके अस्तित्व के लिए जरूरी है।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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