नई दिल्ली: सितंबर 2025 में धरती ने तीसरा सबसे गर्म सितंबर देखा, जिसमें औसत सतही तापमान 16.11 डिग्री सेल्सियस रहा, जो औद्योगिक क्रांति से पहले (1850-1900) के औसत से 1.47 डिग्री सेल्सियस अधिक है। यूरोपीय एजेंसी कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) की रिपोर्ट के अनुसार, यह तापमान 1991-2020 के सितंबर औसत से 0.66 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था। पिछले 12 महीनों का औसत तापमान भी 1.51 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, जो जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को दर्शाता है। ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता स्तर इस वैश्विक तापमान वृद्धि का मुख्य कारण है।
यूरोप और विश्व में गर्मी की मार
यूरोप में सितंबर का औसत तापमान 15.95 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से 1.23 डिग्री अधिक है, जिसने इसे पांचवां सबसे गर्म सितंबर बनाया। फिनलैंड, नॉर्वे और पूर्वी यूरोप में तापमान सामान्य से कहीं ज्यादा था, जबकि पश्चिमी यूरोप के कुछ हिस्सों में मामूली ठंडक रही। विश्व स्तर पर, कनाडा, ग्रीनलैंड, साइबेरिया और अंटार्कटिका के कुछ क्षेत्र असामान्य रूप से गर्म रहे। केवल उत्तरी साइबेरिया और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में तापमान सामान्य से कम देखा गया।
समुद्र और बर्फ पर असर
सितंबर 2025 में समुद्र की सतह का औसत तापमान 20.72 डिग्री सेल्सियस रहा, जो रिकॉर्ड में तीसरा सबसे अधिक है। नॉर्वे सागर, कारा सागर और भूमध्य सागर सामान्य से ज्यादा गर्म रहे। आर्कटिक में समुद्री बर्फ का विस्तार औसत से 12% कम रहा, जो चिंताजनक है। अंटार्कटिका में भी बर्फ का स्तर सामान्य से 5% कम था, जो चौथा सबसे निचला स्तर है। यह जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है।
असमान बारिश और प्राकृतिक आपदाएं
सितंबर में बारिश का पैटर्न असमान रहा। उत्तर-पश्चिम और मध्य यूरोप, फिनलैंड और पूर्वी स्पेन में भारी बारिश से बाढ़ आई, जबकि स्पेन, नॉर्वे और रूस के कुछ हिस्सों में सूखा रहा। भारत, पाकिस्तान और मध्य एशिया में भी भारी वर्षा दर्ज की गई, लेकिन उत्तरी भारत और पूर्वी अमेरिका में बारिश कम रही।
आगे की राह
बढ़ता तापमान और पिघलती बर्फ जलवायु संकट की गंभीरता को उजागर करते हैं। ग्रीनहाउस गैसों को कम करने और टिकाऊ उपाय अपनाने की तत्काल जरूरत है।



