नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा है कि लोकतंत्र अपनी असली ताकत तब हासिल करता है जब हर वर्ग, क्षेत्र और लिंग की आवाज़ को समान रूप से सुना और शामिल किया जाता है। गुप्ता बारबाडोस की राजधानी ब्रिजटाउन में 68वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन के दौरान आयोजित एक कार्यशाला में बोल रहे थे। “लोकतंत्र को समर्थन देने के लिए हमारे संस्थानों को मज़बूत करना” शीर्षक वाली यह कार्यशाला 12 अक्टूबर तक चलेगी।
लोकतांत्रिक संस्थाएं विश्वास की कुंजी
अपने संबोधन में, गुप्ता ने कहा कि सच्चा लोकतंत्र केवल चुनावी प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समानता, जवाबदेही और नागरिक भागीदारी की जीवंत संस्कृति के रूप में विकसित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मज़बूती और नैतिक शासन, जनता का विश्वास बनाए रखने की कुंजी हैं। उन्होंने कहा, “लोकतंत्र की मज़बूती चुनावों की आवृत्ति से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसकी संस्थाएँ कितनी निष्पक्ष हैं, उसका प्रतिनिधित्व कितना समावेशी है, और शासक वर्ग की अंतरात्मा कितनी प्रबुद्ध है।”
74वें संविधान संशोधन का असर
भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का उल्लेख करते हुए गुप्ता ने कहा कि 1993 में हुए 73वें और 74वें संविधान संशोधनों द्वारा पंचायती राज और नगरीय निकायों को संवैधानिक दर्जा मिला और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया गया। इस ऐतिहासिक सुधार ने लगभग 14 लाख महिलाओं को सक्रिय जनजीवन में भागीदारी का अवसर दिया और जमीनी लोकतंत्र की संरचना को नई दिशा दी।
इसी क्रम में उन्होंने संसद द्वारा पारित संविधान (128वां संशोधन) विधेयक, 2023 का उल्लेख किया, जिसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया गया है, जिसमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित सीटें भी सम्मिलित हैं। इसे उन्होंने “लैंगिक न्याय और सहभागी लोकतंत्र की दिशा में एक नैतिक एवं संवैधानिक मील का पत्थर” बताया।
चुनावी प्रक्रिया में सुधार
विधानसभा अध्यक्ष ने पिछले एक दशक में भारत में हुए अनेक चुनावी एवं संस्थागत सुधारों का भी उल्लेख किया, जिनसे पारदर्शिता, सुगमता और जनविश्वास को मज़बूती मिली है। इनमें प्रवासी भारतीयों को मतदान का अधिकार, ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में ‘नोटा’ (NOTA)विकल्प, तथा वीवीपैट (VVPAT) प्रणाली का समावेश शामिल हैं। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4) को रद्द करने के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि इस निर्णय से दोषसिद्ध विधायकों की तत्काल अयोग्यता सुनिश्चित हुई और जनजीवन में जवाबदेही को सुदृढ़ किया गया।
ये भी पढ़ें-स्वदेशी : आजादी की विरासत से आत्मनिर्भर भारत तक
न्यायपालिका प्रहरी
गुप्ता ने आगे कहा कि भारत का लोकतंत्र जहाँ एक ओर तकनीकी और प्रक्रियात्मक रूप से आधुनिक हुआ है, वहीं दूसरी ओर यह संवैधानिक नैतिकता और नागरिक सहभागिता में गहराई से निहित है। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय के फैसलों जैसे कि दोषी विधायकों की तत्काल अयोग्यता और इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित करने से यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका पारदर्शिता और जन-विश्वास की प्रहरी है। ये सभी सुधार भारत की उस आंतरिक प्रतिबद्धता का प्रमाण हैं जिसके माध्यम से हमारा लोकतंत्र स्वयं को अधिक पारदर्शी, न्यायसंगत और जनोन्मुख बना रहा है।
कॉमनवेल्थ के प्रति प्रतिबद्धता
राष्ट्रमंडल के साझा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए विधानसभा अध्यक्ष गुप्ता ने कहा कि 68वें कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री कॉन्फ्रेंस (सीपीसी)में भारत की भागीदारी हमारे संवैधानिक शासन, संस्थागत सुदृढ़ता और सामूहिक प्रगति में अटूट विश्वास का प्रतीक है — यह संदेश देती है कि “लोकतंत्र की असली शक्ति अधिकार में नहीं, बल्कि जवाबदेही और अंतःकरण में निहित है।”



