नई दिल्ली: नए शोध से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, जिससे वैश्विक स्तर पर लाखों इमारतें खतरे में पड़ सकती हैं। मैकगिल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, यदि समुद्र का स्तर सिर्फ 0.5 मीटर बढ़ता है, तो लगभग 30 लाख इमारतें जलमग्न हो सकती हैं। वहीं, अगर यह स्तर 5 मीटर या उससे अधिक बढ़ता है, तो 10 करोड़ से ज्यादा इमारतें प्रभावित हो सकती हैं। यह अध्ययन, जो नेचर जर्नल अर्बन सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित हुआ, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य व दक्षिण अमेरिका के तटीय क्षेत्रों पर केंद्रित है।
भारतीय शहरों पर मंडराता खतरा
भारत के तटीय शहर भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। शोध बताते हैं कि मुंबई का 21.8% हिस्सा सदी के अंत तक पानी में डूब सकता है। चेन्नई में 2040 तक 7.3% क्षेत्र जलमग्न हो सकता है, जो 2100 तक 18% तक बढ़ सकता है। कोच्चि, मैंगलोर, विशाखापत्तनम जैसे शहर भी प्रभावित होंगे। लक्षद्वीप के छोटे द्वीपों, जैसे चेतलाट और अमिनी, में 60-80% भूमि नष्ट हो सकती है।
अर्थव्यवस्था और जीवन पर प्रभाव
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह संकट सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं रहेगा। बंदरगाह, रिफाइनरी और सांस्कृतिक स्थल भी खतरे में होंगे, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और खाद्य आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। प्रोफेसर नताल्या गोमेज के अनुसार, जीवाश्म ईंधन के उपयोग को न रोका गया तो समुद्र का स्तर कई मीटर तक बढ़ सकता है, जिसका असर सदियों तक रहेगा।
- इसको भी पढ़ें: शोध: प्लाज्मिड्स ने कैसे फैलाया एंटीबायोटिक प्रतिरोध
भविष्य की तैयारी जरूरी
शोधकर्ताओं ने एक इंटरएक्टिव मानचित्र तैयार किया है, जो नीति निर्माताओं को जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करेगा। तटीय सुरक्षा, भूमि उपयोग में बदलाव और व्यवस्थित पलायन जैसी रणनीतियां इस संकट से निपटने में कारगर हो सकती हैं। प्रोफेसर माया विलार्ड-स्टीपन का मानना है कि त्वरित तैयारी से तटीय समुदाय भविष्य में सुरक्षित रह सकते हैं।



