राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों का महागठबंधन क्या इस बार 20 साल से सत्ता के सूखे को खत्म करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। लेकिन क्या ये संभव हो पाएगा ? राहुल गांधी ने बिहार में एसआईआर का मुद्दा उठाया और आरजेडी लगातार नीतीश कुमार की सेहत और एंटी इनकमबेंसी को भुनाने की कोशिश में जुटी है, उससे महागठबंधन ने कुछ माहौल बनाया है। लेकिन क्या सिर्फ इसी के बूते महागठबंधन सत्ता हासिल कर लेगा ?
दरअसल, किसी जमाने में आरजेडी के लिए एमवाई यानी मुस्लिम,यादव समीकरण वरदान बनता था लेकिन बीते 20 साल में परिस्थितियां बदल गई हैं। अब ताजा समीकरण ऐसे हैं, जिनके बूते एनडीए मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है। एनडीए नेताओं को लगता है कि उसने जो व्यूहरचना तैयार की है, उसकी वजह से महागठबंधन के लिए सत्ता की राह आसान नहीं होने जा रही।
महिला वोटरों पर दांव
अगर बीते 20 साल देखें तो इसमें एक बड़ा समय ऐसा रहा है, जब महिला वोटरों ने नीतीश कुमार को सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई है। शराब बंदी से लेकर महिलाओ के लिए किए जाने वाले फैसलों की बदौलत ही नीतीश कुमार को महिलाओं का एक बड़ा वर्ग वोट करता रहा है। इस बार के ताजा आंकड़ें देखें तो बिहार में साढ़े तीन करोड़ महिला वोटर हैं। हालांकि ये आंकड़ा एसआईआर के बाद तैयार वोटर लिस्ट से सामने आया है। लेकिन एनडीए गठबंधन ने इन वोटरों की ताकत का पहले से ही अंदाजा लगा रखा है।
यही वजह है कि चुनाव के ऐलान से ठीक पहले महिलाओं के खाते में कुटीर उद्योग के लिए लोन के नाम पर दस दस हजार रुपये की राशि ट्रांसफर की गई। ये एक बड़ दांव है। हालांकि महागठबंधन ने भी सरकार बनने पर महिलाओं को ढाई ढाई हजार रुपये देने का ऐलान किया है। लेकिन नीतीश कुमार ने ये वादा करने की बजाए उस पर अमल कर दिया है। ऐसे में महागठबंधन की राह में महिला वोटर ब्रेकर बन सकती हैं।
ईबीसी वोटर दूसरी बाधा
हालांकि महागठबंधन अति पिछड़े वर्ग को रिझाने की कोशिश कर रहा है ताकि वह नीतीश के इस वोट बैंक में सेंध लगा सके। दरअसल इस वर्ग का लगभग 36 फीसदी वोट है और ये वोटर एक सौ से अधिक जातियों में बंटा है। माना जाता रहा है कि ये ऐसा वोट बैंक है, जो नीतीश कुमार के साथ जाता रहा है।
ऐसे में अगर महागठबंधन इस वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब होता है तो ही महागठबंधन की राह कुछ आसान हो सकती है लेकिन अगर ये सेंध नहीं लगी तो यही वोटर, उसे जीत से दूर ले जा सकता है।
दलित वोटरों का बंटवारा
बिहार में लगभग 20 फीसदी वोटर दलित हैं। अब तक रामविलास पासवान की पार्टी इन वोटरों में मजबूत रही है। लेकिन यहां कांग्रेस भी फिर से अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। किसी जमाने में ये कांग्रेस का मजबूत वोट बैंक होता था। इस बार रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान इसी वोट बैंक के बूते एनडीए में अधिक सीटों का दावा कर रहे हैं। ऐसे में महागठबंधन की राह कितनी मुश्किल और कितनी आसान होगी। इसका फैसला इस वोट बैंक पर निर्भर करेगा। अगर ये वोट कांग्रेस की वजह से महागठबंधन को जाता है तो इससे एनडीए को नुकसान हो सकता है।
यादव मुस्लिम वोटर
ये परंपरागत तौर पर महागठबंधन यानी आरजेडी व कांग्रेस का वोटर रहा है। इस बार भी महागठबंधन को लगता है कि ये वोट उसकी झोली में आएगा, क्योंकि बीजेपी की वजह से कम से कम मुस्लिम वोटर एनडीए के साथ नहीं जाएगा। एसआईआर के मुद्दे को लेकर भी उसे उम्मीद है कि मुस्लिम वोट इस बार शायद न बंटे। महागठबंधन की चिंता ये है कि चुनाव से ऐन पहले महिलाओं के खाते में डाली गई राशि की वजह से यादव महिला वोटर उससे न छिटक जाएं। यही वजह है कि महागठबंधन का जोर इस बार सरकार बनने पर महिलाओं के खाते में ढाई हजार रुपये हर माह देने पर है। इसका वह लगतार प्रचार भी कर रही है।
जनसुराज पर है नजर
महागठबंधन जनसुराज पार्टी को एक राहत के रूप में देख रहा है। महागठबंधन दलों के नेताओं को लग रहा है कि जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर भले ही बिहार के अरविंद केजरीवाल न बन पाएं लेकिन अगर वो अपना असर दिखाए तो इसका नुकसान एनडीए को ही होगा। जाहिर है कि प्रशांत किशोर की पार्टी को जो वोट मिलेगा, वो एनडीए का ही होगा। इससे एनडीए के वोट बंटने से महागठबंधन को फायदा होगा। लेकिन इसके बावजूद महागठबंधन के घटक दल बेहद सतर्क हैं। इसकी वजह ये है कि शुरु में बीजेपी को भी दिल्ली में लगा था कि अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएंगे लेकिन लगातार दो चुनाव में केजरीवाल का जलवा ऐसा चला कि बीजेपी दिल्ली में 70 में से एक बार तो तीन और दूसरी बार महज आठ सीटें ही जीत सकी थी।



