नई दिल्ली: NCERT की नई पहल: भारतीय शिक्षा में एक नया अध्याय जोड़ते हुए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने हाल ही में दो खास शैक्षिक मॉड्यूल जारी किए हैं। पहला, ‘स्वदेशी: वोकल फॉर लोकल’ मध्यम स्तर के छात्रों के लिए और दूसरा ‘स्वदेशी: आत्मनिर्भर भारत के लिए’ माध्यमिक कक्षाओं के लिए। ये सामग्री न केवल इतिहास के पन्नों को पलटती हैं, बल्कि उन्हें आज की चुनौतियों से जोड़कर छात्रों को सोचने पर मजबूर करती हैं। कल्पना कीजिए, कक्षा में बैठे बच्चे 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ विजन तक की पूरी कहानी जीवंत रूप से अनुभव कर रहे हों, यही इन मॉड्यूल्स का जादू है।
स्वतंत्रता संग्राम की वो अनकही दास्तान
ये मॉड्यूल स्वदेशी आंदोलन को सिर्फ विदेशी सामान का बहिष्कार नहीं बताते, बल्कि एक रचनात्मक क्रांति के रूप में पेश करते हैं। उस दौर में भारतीयों ने घरेलू विकल्प गढ़े है, जैसे बंगाल के रसायन कारखाने या तारापुर के स्टील प्लांट्स। महात्मा गांधी ने शिक्षा को स्वदेशी से जोड़ा, तो रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे आजादी का सच्चा पैमाना माना। मॉड्यूल में मोदी जी के इस साल के स्वतंत्रता दिवस भाषण का अंश भी है, जहां उन्होंने आत्मनिर्भरता को ‘विकसित भारत’ की नींव कहा। शिक्षकों को सुझाव दिया गया कि छात्रों के साथ मिलकर ‘वोकल फॉर लोकल’ का प्रचार करें। एक तरह का सामूहिक होमवर्क, जो कक्षा से बाहर निकलकर समाज तक पहुंचे।
आधुनिक भारत से स्वदेशी का नया चेहरा
अब स्वदेशी सिर्फ पुरानी किताबों में सिमटा नहीं, यह रणनीतिक सोच बन चुका है। मॉड्यूल इनोवेटिव तरीके से इसे मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भर अभियान से जोड़ते हैं। उदाहरण स्वरूप, अमूल की डेयरी क्रांति, इसरो की अंतरिक्ष उपलब्धियां या आयुर्वेद की वैश्विक पहचान है, ये सब भारतीय ब्रांड्स का भरोसा जगाते हैं। भारत ने रक्षा, स्वास्थ्य और स्पेस जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भर कदम उठाए हैं, जो दिखाते हैं कि स्वदेशी अब ‘खरीदो भारतीय’ से कहीं आगे है। यह विश्वास की लहर है, जो घरेलू उत्पादों को ग्लोबल स्तर पर मजबूत बनाती है।
डिजिटल युग में स्वदेशी AI का उदय
आज के डिजिटल दौर में स्वदेशी को नया आयाम मिला है। मॉड्यूल ‘स्वदेशी AI’ की अवधारणा पेश करते हैं, जो चेतावनी देती है कि चैटजीपीटी या गूगल जेमिनी जैसी विदेशी टूल्स पर निर्भरता न करें। इसके बजाय, भारत को अपनी AI क्षमताएं विकसित करनी चाहिए, जो हिंदी जैसी स्थानीय भाषाओं, कृषि समस्याओं या सरकारी सेवाओं के अनुकूल हों। इससे डेटा संप्रभुता बनी रहेगी और समाधान भारतीय जरूरतों पर केंद्रित होंगे। यह विचार छात्रों को सोचने को प्रेरित करता है कि तकनीक कैसे हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सकती है।
शिक्षा का ये नया मिशन
एनसीईआरटी का यह कदम सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं बांटता, यह छात्रों को अतीत से सीखकर भविष्य गढ़ने की कला सिखाता है। स्वदेशी को रणनीति बनाकर ये मॉड्यूल आने वाली पीढ़ी को चुनौतियों के लिए तैयार करते हैं।



