नई दिल्ली: कैंसर अब दुनिया भर में हृदय संबंधी बीमारियों के बाद मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण बन चुका है। लैंसेट जर्नल में प्रकाशित ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2023 की रिपोर्ट से पता चलता है कि 1990 से 2023 के बीच कैंसर के मामलों में 105% और मौतों में 74% की तेज वृद्धि हुई। 2023 में वैश्विक स्तर पर 1.85 करोड़ नए मामले सामने आए, जबकि 1.04 करोड़ लोगों की मौत हुई। यह आंकड़े त्वचा के सामान्य कैंसर को छोड़कर हैं।
कम आय वाले देशों पर अधिक दबाव
रिपोर्ट के अनुसार, 58% नए मामले और 66% मौतें कमजोर व मध्यम आय वाले देशों में दर्ज हुईं, जहां स्वास्थ्य संसाधनों की कमी पहले से ही चुनौती है। अध्ययन 204 देशों में 47 प्रकार के कैंसर और 44 जोखिम कारकों का विश्लेषण करता है, जिसमें कैंसर रजिस्ट्री और मृत्यु डेटा का उपयोग किया गया। 2050 तक मामलों में 60.7% और मौतों में 74.5% की बढ़ोतरी का अनुमान है, जिसमें आधे से अधिक मामले और दो-तिहाई मौतें गरीब देशों में होंगी। अमीर देशों में मौतों में 43% वृद्धि संभावित है, जबकि गरीब देशों में 91% तक।
आबादी वृद्धि से चुनौतियां
बढ़ती जनसंख्या और बुजुर्गों की संख्या कैंसर बोझ को बढ़ा रही है। उम्र-समायोजित दरों में वैश्विक स्तर पर मौतों में 5.6% कमी आ सकती है, लेकिन कुल संख्या में भारी उछाल होगा। संयुक्त राष्ट्र के 2030 तक गैर-संक्रामक रोगों से असमय मौतों को एक-तिहाई कम करने के लक्ष्य से प्रगति बहुत पीछे है। 2023 में स्तन कैंसर सबसे आम था, जबकि फेफड़ों का कैंसर मौतों का प्रमुख कारण।
रोके जा सकने वाले जोखिम कारक
कैंसर मौतों का 42% (लगभग 43 लाख) रोके जा सकने वाले कारणों से जुड़ा, जैसे तंबाकू (21%), असुरक्षित यौन संबंध, मोटापा, खराब आहार और प्रदूषण। पुरुषों में तंबाकू-शराब प्रमुख, महिलाओं में मोटापा-उच्च रक्त शर्करा। गरीब देशों में असुरक्षित संबंध 12.5% मौतों के लिए जिम्मेदार। विशेषज्ञ चेताते हैं कि संसाधन-सीमित देशों में बोझ तेजी से बढ़ेगा, यदि रोकथाम व जांच पर ध्यान न दिया।
विशेषज्ञों की चेतावनी व समाधान
अमेरिकी विशेषज्ञ डॉ. लीजा फोर्स ने कहा कि कैंसर नियंत्रण को वैश्विक प्राथमिकता बनाना जरूरी है। नेपाल के डॉ. मेघनाथ धीमाल ने गरीब देशों में संकट की ओर इशारा किया। हर देश को रोकथाम, प्रारंभिक जांच, इलाज पहुंच और बेहतर डेटा संग्रह पर जोर देना चाहिए, वरना 2050 तक यह महामारी बन सकता है।



