नई दिल्ली: और महागठबंधन के साथ ही क्या प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी तीसरा विकल्प बन सकेगी ? बीते लगभग एक साल से प्रशांत किशोर ने जिन मुद्दों को उठाया है, वे अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की लाइन पर ही हैं लेकिन क्या वे बिहार में केजरीवाल की तरह ही कामयाबी के झंडे गाड़ सकेंगे ?
ये सवाल इसलिए भी है, क्योंकि प्रशांत किशोर और अरविंद केजरीवाल के मुद्दों में भले ही समानता हो लेकिन उनके उभार में बहुत अंतर है। केजरीवाल की पार्टी, आंदोलन से निकली है। पार्टी बनने से पहले अन्ना हजारे की अगुवाई में धरना और जनआंदोलन हुआ, जिसे व्यापक समर्थन मिला था। लेकिन प्रशांत किशोर की अगर जनयात्रा को छोड़ दें तो उनके साथ ऐसा कुछ नहीं है।
इतना जरुर है कि जिस तरह से अरविंद केजरीवाल के आने से पहले दिल्ली की राजनीति कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही सिमटी हुई थी। लगभग वही स्थिति बिहार में है। वहां की राजनीति मुख्य तौर पर एनडीए और महागठबंधन के इर्द गिर्द ही घूमती रही है। ऐसे में ये सवाल बड़ा है कि प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी को पहले चुनाव में कितनी कामयाबी मिलती है ?
दिल्ली में जब अरविंद केजरीवाल की पार्टी मैदान में आयी थी, उस वक्त साफ संकेत थे कि केजरीवाल की वजह से नुकसान कांग्रेस का होगा और वो बाद में सही साबित हुआ, लेकिन बिहार में अभी ऐसे हालात नजर नहीं आते। अब तक ये साफ नहीं है कि जनसुराज पार्टी, इस चुनाव में महागठबंधन को नुकसान पहुंचाएगी या एनडीए को। लेकिन इतना जरुर है कि इस बार इन दोनों गठबंधनों के बीच जनसुराज पार्टी खुद को बिहार के वोटरों के सामने एक विकल्प के रूप में जरुर पेश करने की कोशिश कर रही है।
चुनौतियां कई हैं
जनसुराज पार्टी के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं। सबसे महत्वपूर्ण है कि केजरीवाल के शुरुआती दौर की तरह न तो उनके पास अन्ना हजारे जैसा बड़ा चेहरा है और न ही इंडिया अगेंस्ट करप्शन की तरह का कोई आंदोलन। ये सभी जानते हैं कि केजरीवाल को उस वक्त देश की मुख्य विपक्षी पार्टी का परोक्ष समर्थन भी था और जनसमर्थन भी। बिहार में फिलहाल जनसुराज पार्टी के साथ ऐसा कुछ नहीं है।
इसके अलावा चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण प्रशांत किशोर की छवि का मामला है। प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार की भूमिका से राजनीतिज्ञ की भूमिका में आए हैं। जबकि केजरीवाल ने आंदोलन से पहले ही शीला दीक्षित सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया था। उसके बाद आंदोलन और फिर राजनीतिक पार्टी। इस तरह से केजरीवाल के पास अपना आधार बनाने के लिए पर्याप्त समय था। लेकिन प्रशांत किशोर की पार्टी महज एक साल पुरानी ही है। ऐसे में प्रशांत किशोर के लिए संगठन बनाने से लेकर जनता में अपना आधार मजबूत करने जैसी कई चुनौतियां हैं। अगर वे इन चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना करते हैं तो ही वे दोनों गठबंधनों के सामने मजबूत विकल्प बनेंगे। वरना, उनकी पार्टी, दोनों गठबंधनों के बीच हार जीत की भूमिका बनाने वाली पार्टी बनकर रह जाएगी।
पक्ष और विपक्ष पर भ्रष्टाचार के आरोप
बिहार की राजनीति में भ्रष्टाचार के मुद्दे ने नया तूफान खड़ा कर दिया है। जन स्वराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर (पीके) ने इस बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सबसे करीबी मंत्री अशोक चौधरी पर 200 करोड़ रुपये की जमीन खरीद का गंभीर आरोप लगाया है। वहीं उन्होंने राजद पर निशाना साधते हुए कहा कहा, अगर नीतीश कुमार अपराध और भ्रष्टाचार के भीष्म पितामह हैं तो तेजस्वी यादव दुर्योधन हैं। तेजस्वी यादव और लालू यादव ने ही तो इस राज्य में अपराध और भ्रष्टाचार को समाज का भाग बनाया।



