नई दिल्ली: अफगानिस्तान का बगराम एयरबेस (Bagram Airbase Afghanistan) एक बार फिर वैश्विक राजनीति का केंद्र बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) द्वारा इस एयरबेस पर दोबारा नियंत्रण स्थापित करने की योजना को लेकर चीन और तालिबान (Taliban) ने सख्त प्रतिक्रिया दी है। रणनीतिक दृष्टि से यह एयरबेस बेहद अहम माना जाता है क्योंकि यह अफगानिस्तान में चीनी सीमा के पास स्थित है और चीन के परमाणु ठिकानों से भी नजदीकी रखता है।
ट्रंप का बयान और अमेरिकी इरादा
ब्रिटेन की राजकीय यात्रा के दौरान ट्रंप ने गुरुवार को घोषणा की कि उनकी सरकार बगराम एयरबेस को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि यह ठिकाना चीन के परमाणु हथियार बनाने वाले केंद्रों के बेहद करीब है, इसलिए इसकी सुरक्षा अमेरिका के लिए अनिवार्य है। उनके इस बयान ने संकेत दिए कि निकट भविष्य में अमेरिकी सैनिक फिर से इस एयरबेस पर लौट सकते हैं। उल्लेखनीय है कि चार साल पहले अमेरिका ने अफगानिस्तान से सैन्य वापसी की थी, जिसके बाद यह ठिकाना तालिबान के कब्जे में चला गया था।
अफगानिस्तान और तालिबान का विरोध
ट्रंप के बयान के तुरंत बाद अफगानिस्तान और तालिबान दोनों ने कड़ा विरोध जताया। तालिबान (US-Taliban Talks) के वरिष्ठ अधिकारी जाकिर जलाल ने कहा कि अफगानिस्तान इतिहास में कभी भी विदेशी सैन्य उपस्थिति को स्वीकार नहीं करता और भविष्य में भी इसे मंजूर नहीं किया जाएगा। उन्होंने दोहा वार्ता और समझौते का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि विदेशी फौजों की वापसी की संभावना पहले ही खारिज की जा चुकी है। अफगान सरकार ने भी दोहराया कि किसी भी परिस्थिति में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी स्वीकार्य नहीं होगी।
चीन की कड़ी प्रतिक्रिया
ट्रंप की योजना पर चीन ने भी कड़ा ऐतराज जताया। बीजिंग में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने मीडिया से बातचीत में कहा कि किसी भी प्रकार का कदम जो क्षेत्रीय तनाव और टकराव को बढ़ावा दे, वह अस्वीकार्य है। उन्होंने जोर देकर कहा कि चीन अफगानिस्तान की स्वतंत्रता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करता है। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि सभी पक्ष क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करने में रचनात्मक भूमिका निभाएंगे।
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अमेरिका-तालिबान वार्ता की खबर
इस बीच वाल स्ट्रीट जर्नल ने रिपोर्ट दी है कि अमेरिका और तालिबान के बीच गुप्त वार्ता चल रही है। इन बातचीतों का मकसद बगराम एयरबेस को आतंकवाद-निरोधी अभियानों के लिए अमेरिकी सैनिकों के उपयोग में लाना बताया जा रहा है। हालांकि यह जानकारी आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि अमेरिका इस ठिकाने को फिर से सक्रिय करने की दिशा में गंभीरता से विचार कर रहा है।
बगराम एयरबेस को लेकर अमेरिका, तालिबान और चीन के बीच तनातनी ने एक बार फिर इस क्षेत्र को वैश्विक राजनीति का हॉटस्पॉट बना दिया है। ट्रंप के इरादों ने जहां अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं को उजागर किया है, वहीं तालिबान और अफगान सरकार की सख्त प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि विदेशी फौजों की मौजूदगी अब भी अफगानिस्तान के लिए अस्वीकार्य है। चीन का कड़ा रुख इस मामले को और संवेदनशील बना रहा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिका वाकई बगराम एयरबेस पर दोबारा लौट पाता है या फिर इस योजना को क्षेत्रीय विरोध के चलते टालना पड़ता है।



