नई दिल्ली: पुणे स्थित अगरकर अनुसंधान संस्थान (एमएसीएस) के शोधकर्ताओं ने एस्परगिलस सेक्शन निगरी की दो नई प्रजातियों की पहचान की है। इनके नाम एस्परगिलस ढाकेफाल्करी और एस्परगिलस पेट्रीसियाविल्टशायरी है।पश्चिमी घाट से एकत्र किए गए मिट्टी के नमूनों से दो ब्लैक एस्परगिलस ए. एक्यूलेटिनस और ए. ब्रुनेओवियोलेसियस का पहला भौगोलिक रिकॉर्ड दर्ज किया है। एस्परगिलस सेक्शन निगरी को आमतौर पर ब्लैक एस्परगिलस के रूप में जाना जाता है। एस्परगिलस वंश तंतुमय कवकों के एक विविध समूह से बना है जो विभिन्न पारिस्थितिक क्षेत्रों में सर्वत्र वितरित हैं और जिनका चिकित्सीय, औद्योगिक और पारिस्थितिक महत्व बहुत अधिक है।
एस्परगिलेसी परिवार के व्यवस्थित विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने कड़े स्वर्ण मानक प्रोटोकॉल स्थापित किए हैं; एस्परगिलस में प्रजातियों के प्रमाणीकरण के लिए एकीकृत या बहु-चरणीय वर्गीकरण दृष्टिकोण । इस बहु-चरणीय वर्गीकरण दृष्टिकोण को अपनाते हुए शोध दल ने आईटीएस और सीएएम (पहचान के लिए जीन), बीईएनए और आरपीबी2 (फ़ाइलोजेनी के लिए जीन) का उपयोग करके विस्तृत रूपात्मक लक्षण वर्णन को आणविक फ़ाइलोजेनेटिक विश्लेषणों के साथ जोड़ा। बहु-जीन फ़ाइलोजेनेटिक विश्लेषण का अनुमान अधिकतम संभाव्यता विश्लेषणों (उच्च सांख्यिकीय समर्थन के साथ) के माध्यम से लगाया गया और दो नई प्रजातियों की विशिष्ट वंशावली की पहचान की गई।
कितना अहम है ब्लैक एस्परगिलस
ब्लैक एस्परगिलस को औद्योगिक अनुप्रयोगों में विशेष रूप से साइट्रिक अम्ल उत्पादन, खाद्य कवक विज्ञान, किण्वन प्रौद्योगिकी और कृषि में सर्वाधिक उपयोगी माना जाता है। यह सूची भारत से एस्परगिलस सेक्शन निग्री की फॉस्फेट घुलनशील क्षमता पर आधारित एक शोध थीसिस का भी हिस्सा है। ए. ढाकेफाल्करी की विशेषता तीव्र कॉलोनी वृद्धि है, जो
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इन वैज्ञानिकों ने की खोज
पश्चिमी घाटों से एस्परगिलस सेक्शन निगरी के भीतर नवीन प्रजातियों की पिछली खोज विदेशी शोधकर्ताओं द्वारा की गई थी। यह अध्ययन मूल रूप से डॉ. राजेश कुमार केसी द्वारा भारत के राष्ट्रीय कवक संवर्धन संग्रह, एआरआई, पुणे में एएनआरएफ (पूर्ववर्ती एसईआरबी) परियोजना के एक भाग के रूप में शुरू किया गया था और एमएसीएस एआरआई कोर-फंडिंग के समर्थन से आगे जारी रहा। हरिकृष्णन के., राजेश कुमार के.सी. और रवींद्र एम. पाटिल द्वारा लिखित यह लेख इस खंड में दो नई प्रजातियों की पहचान और उनका वर्णन करने वाली पहली भारतीय शोध टीम है।



