पक्षियों की हत्या का कारण बनती मशीनें

पक्षियों की मृत्यु दर लगातार बढ़ रही है, WII ने दावा किया है कि थार में पक्षियों की मृत्यु दर सबसे अधिक है। आखिर क्या कारण है? आइये जानते हैं

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हर साल सितंबर महीने के आसपास असम के जतिंगा गांव में पक्षियों की आत्महत्या का मुद्दा चर्चा में रहता है। लेकिन इस बार आत्महत्या के मुद्दे के बीच पक्षियों की हत्या का मुद्दा भी खबरों में बना हुआ है। इस बार पक्षियों की हत्या के पीछे इंसान नहीं बल्कि मशीनें हैं।

दरअसल, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि थार मरुस्थल में जहाँ पवनचक्कियां लगी हैं, उन क्षेत्रों के आसपास पक्षियों की मृत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक है। बाद में कुछ शोधकर्ताओं ने 3,000 वर्ग किमी क्षेत्र का सर्वे किया और 124 पक्षियों को मरा हुआ पाया, इसमें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे पक्षी भी शामिल थे। इस रिसर्च से पता चला कि एक विंड टरबाइन से हर महीने औसतन 1.24 पक्षियों की मौत हो जाती है। इसमें सबसे अधिक मृत्यु दर रैप्टर्स (शिकारी पक्षी) में देखी गई। ये पक्षी शिकार के बाद उड़ान के समय टरबाइन से टकरा जाते हैं और उनकी मौत हो जाती है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

पर्यावरणविद डॉ सुमित डूकिया जी कहते हैं “पश्चिमी राजस्थान में पिछले डेढ़ दशक में भारी संख्या में पवन चक्कियां लगाई गई हैं, जिससे यहां कई प्रकार के पक्षियों के पवन चक्कियों से सीधे टकराकर मरने के कई प्रत्यक्ष एपिसोड देखे गए। इसके अलावा परोक्ष रूप से इन पवन चक्कियों से जो बिजली उत्पादन होती है, उसको ले जाने के लिए जो उच्च क्षमता के बिजली के तारों का जाल बिछा है उससे भी कभी-कभी पक्षियों के मरने के समाचार देखे गए हैं”।

भारत में पक्षियों के संरक्षण के लिए कौन-कौन से कानून हैं

भारत में, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत पक्षियों की हत्या करना एक गंभीर अपराध है। इस अधिनियम के तहत कम से कम 7 साल की कैद और 50,000 रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा भारत ने साइबेरियन क्रेन, समुद्री कछुए (2007), डुगोंग (2008) और शिकारी/रैप्टर पक्षियों (2016) को सुरक्षित रखने के लिए CMS (प्रवासी प्रजातियों पर कन्वेंशन) के साथ समझौता ज्ञापन (MOU) पर भी हस्ताक्षर किये हैं।

पक्षियों को बचाने के लिए CMS जैसे कन्वेंशन कितने प्रासंगिक?

डॉ सुमित डूकिया के अनुसार “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवासी पक्षियों और अन्य जीवों के लिए कन्वेंशन फॉर माइग्रेटरी स्पीशीज (CMS) एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता है। जिसके अंदर प्रवासी प्रजातियों के वर्ष भर के वितरण क्षेत्र में आने वाले सभी देशों को उसके संरक्षण और रखरखाव का ध्यान देना एक नैतिक जिम्मेदारी में माना जाता है। यह एक बहुत ही अच्छा अंतरराष्ट्रीय समझौता है और उनके पक्षियों के और अन्य प्रजातियों के संरक्षण के अंदर काफी कारगर साबित हो रहा है।

क्या समुद्री पवन ऊर्जा भी विकल्प हो सकता है?

समुद्री पवन ऊर्जा समुद्र के अंदर या किनारे से थोड़ी दूरी पर स्थापित पवन टरबाइनों द्वारा उत्पन्न की जाती है। ये टरबाइन समुद्री हवाओं से ऊर्जा प्राप्त करते हैं, जो स्थलीय हवाओं की तुलना में अधिक तेज होती हैं। विशेषज्ञ मान रहे हैं “समुद्री इलाके में पवन चक्कियों के लगाने का भारत में पक्षियों के टकराने के अनुभव बहुत कम है परंतु समुद्र के अंदर जो पवन ऊर्जा पार्क है, हो सकता है वह धरती पर लगने वाली पवन चक्कियों की तुलना में  पर्यावरण को थोड़ा कम नुकसान पहुंचाए”।

पक्षियों को इस तरह की आपदाओं से बचाने के लिए उपाय

डॉ डूकिया कहते हैं “मानवीय विकास और प्रकृति दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और अनवरत हो रहे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से धरती की जैव विविधता को बहुत नुकसान पहुंचा है। पिछले कुछ दशक से गैर पारंपरिक ऊर्जा के स्रोत जैसे सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा इत्यादि को एक अच्छा अल्टरनेटिव सोर्स ऑफ एनर्जी माना गया था परंतु अब वैज्ञानिक प्रमाण के साथ यह कहा जाने लगा है कि इससे भी कुछ-कुछ इलाकों में जैव विविधता पर काफी प्रतिकूल असर पड़ा है। पश्चिमी राजस्थान में पवन ऊर्जा के बड़े-बड़े विंड टरबाइन लगे हैं और यही इलाका सेंट्रल एशिअन फ्लाईवे, जो कन्वेंशन आफ माइग्रेटरी स्पीशीज के अंदर प्रवासी पक्षियों के लिए चिन्हित किया गया है, उसके रास्ते में आता है। प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में प्रवासी पक्षी इसी रास्ते से भारतीय उपमहाद्वीप की तरफ आते हैं और वापस लौटते वक्त भी इसी रास्ते से जाते हैं। इसलिए ऐसे स्ट्रैटेजिक लोकेशंस जहां पर किसी अन्य प्रजाति को बहुत नुकसान पहुंच रहा है, उन जगहों पर हमें ध्यान देने की जरूरत है। कुछ वैज्ञानिक शोध में यह निकलकर आया है कि अगर पवन ऊर्जा संयंत्र की जो पंखे की एक ब्लेड है, वह अगर सफेद की जगह काला रंग से कर दी जाए तो पक्षियों के मरने की संख्या काफी कम हो जाएगी, क्योंकि वह काला पंख पक्षी को दूर से दिख जाएगा। इस पर अभी भारत में बहुत कम काम हुआ है और जब यह शोध परिणाम सामने आएंगे तब और अच्छी जानकारी हमें प्राप्त होगी”।

इसी के साथ कुछ अन्य शोध बताते हैं कि पवन ऊर्जा के लिए स्थान चयन भी सोच समझ कर होना चाहिए। जिन क्षेत्रों में पक्षियों की आबादी अधिक है, वहाँ विंड टरबाइन लगाना खतरनाक हो सकता है। इसके अलावा, पालिसी में भी कुछ बदलाव होने चाहिए। जैसे: हर पवन ऊर्जा परियोजना से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) होना ही चाहिए। पक्षी कितने ऊपर उड़ते हैं और और उनका प्रवास मार्ग का अध्ययन कर टरबाइनों की योजना बनाई जानी चाहिए। इसके अलावा आधुनिक तकनीक से टरबाइनों को इस तरह डिज़ाइन किया जाए कि टक्कर की संभावना कम हो।

भारत सरकार का 2030 तक 70 गीगा वाट समुद्री पवन ऊर्जा विकसित करने का लक्ष्य है। भारत की पवन ऊर्जा में बढ़त एक अच्छा कदम है, लेकिन इसके साथ जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों की अनदेखी नहीं की जा सकती। यदि योजनाबद्ध और सतर्कता से समुद्री पवन ऊर्जा का विकास किया जाए तो यह भारत के हरित भविष्य के लिए विकल्प बन सकती है। थार रेगिस्तान में पक्षियों की मृत्यु दर चिंता का विषय है और पालिसी में बदलाव की आवश्यकता दर्शाती है कि नवीकरणीय ऊर्जा का विकास और प्रकृति का संतुलन–दोनों को साथ लेकर चलना होगा।

source –

Kuldeep Dwivedi

kuldeepd999@gmail.com

NewG India का अनुभवी चेहरा, 2017 में RGPV से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। सिविल सर्विसेज कोच और लेखक के तौर पर शिक्षाकुल, एग्जामपुर, कॉसमॉस पब्लिकेशन जैसे अनेक संस्थानों में काम करने का अनुभव प्राप्त है। वर्तमान में NewG India में एंकर एवं रिसर्च स्कॉलर के तौर पर कार्य कर रहे हैं।

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