पटना: “भइया, इहां क राजनीति बहुत कठिन बा। आज लगभग तीन दशक से चेहरा क नाम पर दुई लोगन ही उभरलन। एक त लालू क समर्थक या दूसरा लालू क विरोधी। जे भी विरोधी क रूप में आग आयल उ नीतीश क साथे जुड़ गयल। पार्टी भले भाजपा अउरी कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर बा। वोटर भी ओकर बिहार में बाड़न, लेकिन उनका पाले कवनों चर्चित चेहरा नइखें।” यह कहना है बक्सर जिले के किसान राम भूवन का। इस बात में हकीकत है। इसको सब लोग मानते भी हैं। भाजपा और कांग्रेस इस रिक्ति की भरपाई करने में असफल रही हैं। यही कारण है कि ये दोनों पार्टियां भी नीतिश अथवा लालू के पुत्र तेजस्वी के चेहरे पर ही निर्भर हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तीन दशक बाद तीसरी जनशक्ति के रूप में प्रशांत कुमार उभरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह अभी भविष्य की गर्त में है। इसका आंकलन विधानसभा चुनाव के बाद ही किया जा सकता है। पिछली बार ऐसा लगा कांग्रेस के नेता कन्हैया कुमार युवाओं में अपनी पकड़ काफी मजबूत करेंगे, लेकिन उन्हें कांग्रेस ने टिकट ही नहीं दिया। कहा जाता है कि लालू प्रसाद नहीं चाहते कि तेजस्वी के सामने कोई युवा चर्चित नेता बिहार में आये। इस कारण उन्होंने कांग्रेस से कन्हैया को बिहार में आने नहीं दिया।
नई दुनिया के संपादक सतीश श्रीवास्तव ने कहा
इस संबंध में बिहार के गोपालगंज के रहने वाले और नई दुनिया के संपादक सतीश श्रीवास्तव का कहना है कि यह दुर्भाग्य है कि जन आंदोलनों की शुरूआत करने वाले बिहार में आज प्रमुख पार्टियों के पास चेहरा नहीं है। वहां की राजनीति अब सिर्फ दो ही चेहरों पर टिक गयी है। कुछ चेहरे आये भी तो वे लालू और नीतिश के आगे टिक नहीं सके और छोटी पार्टियों के रूप में ही अपनी पहचान बनाकर सीमट गये। इससे लोगों की मजबूरी हो गयी।
अध्यापक ने कहा, मुश्किल है इन दोनों नेताओं की काट
वहीं बिहार में अध्यापक रविकांत का कहना है कि यहां जातियों में बंट जाने के कारण काम गौंड हो गया। कोई ऐसा चेहरा नहीं आया जो युवाओं को आकर्षित करे। इस कारण तेजस्वी और नीतिश तक ही लोग सिमट कर रह गये। अब तो इन दो नेताओं से बाहर निकलना ही मुश्किल सा लगता है। हालांकि राजनीति में कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन अभी तक तो कोई संभावना नहीं दिख रही है।
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समाजशास्त्री ने कहा, आने वाले दशक में कोई नया चेहरा उभरेगा
वहीं समाजशास्त्री प्रो. राम विलास का कहना है कि बिहार में संकीर्णता ज्यादा होने के कारण, नये चेहरों का उभरना मुश्किल होता है। जब जे.पी आंदोलन हुआ तो सैकड़ों नेता निकले। उस आंदोलन की पृष्ठभूमि भी बिहार थी, लेकिन उसमें भी चेहरा जे.पी ही थे। इसके बाद उसी रूप में जे.पी आंदोलन से बिहार में एक समय जार्ज फर्नांडिस, लालू यादव, नीतिश कुमार कांग्रेस के विरोधी के रूप में आगे आये, लेकिन लालू यादव नई प्रयोगशाला में आगे निकले और आगे ही बढ़ते चले गये। नीतिश ने एक नए लालू के विरोधी के रूप में उभरकर आये। इसके बाद कोई नेता वहां की राजनीति को परखने में सक्षम नहीं हो सका, लेकिन आने वाले दशक में जरूर किसी नये चेहरे के उभरने की संभावना जतायी जा सकती है।



