पटना: बिहार की राजनीतिक गलियारों में मधुबनी संसदीय क्षेत्र की जाले विधानसभा सीट हमेशा से चर्चा का विषय रही है, और 2025 का चुनाव भी इससे अलग नहीं होगा। इस सीट का राजनीतिक इतिहास बेहद रोचक रहा है, जहाँ मतदाताओं ने जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर विचारधारा को महत्व दिया है। एक समय यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अभेद्य किला हुआ करता था, लेकिन समय के साथ यहाँ की राजनीति में कई मोड़ आए। भाकपा (CPI) ने यहाँ लाल झंडा फहराया, तो वहीं समाजवाद और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों ने भी अपनी जड़ें जमाईं। 21वीं सदी की शुरुआत में, बीजेपी ने यहाँ अपनी पैठ मजबूत की और अब यह सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती है। मौजूदा विधायक और मंत्री जीवेश कुमार के सामने इस बार अपनी हैट्रिक लगाने की बड़ी चुनौती है।
जाले का बदलता राजनीतिक इतिहास:-
- कांग्रेस का एकाधिकार (1952-1969): शुरुआती 15 वर्षों तक इस सीट पर कांग्रेस का राज रहा।
- लाल झंडे का उदय: 1969 में भाकपा के खादिम हुसैन ने कांग्रेस को हराकर जीत दर्ज की।
- विजय कुमार मिश्र का दबदबा: 1990 से 2015 तक, विजय कुमार मिश्र का इस सीट पर दबदबा रहा। उन्होंने कांग्रेस से बीजेपी और फिर जदयू तक का सफर तय किया। 1985 में जीते कांग्रेस के लोकेश नाथ झा शिक्षा मंत्री भी रहे थे।
- बीजेपी का उदय और जीवेश कुमार की जीत: 2015 में बीजेपी ने जीवेश कुमार को मैदान में उतारा और उन्होंने विजय कुमार मिश्र के बेटे ऋषि मिश्रा को हराकर जीत दर्ज की। जीवेश कुमार अब तक दो बार मंत्री बन चुके हैं और 2025 के चुनाव में हैट्रिक लगाने की तैयारी में हैं।
विजय कुमार मिश्र ने पुत्र के लिए छोड़ी थी सीट
1990, 2000 और 2010 का चुनाव जीतने वाले विजय कुमार मिश्र (पूर्व केंद्रीय मंत्री ललित नारायण मिश्र के पुत्र) ने 2014 में अपने पुत्र ऋषि मिश्रा को जाले की बागडोर सौंपने के लिए विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था। उप-चुनाव में ऋषि मिश्रा जदयू के टिकट पर चुनाव जीते थे।
जाले की पहचान: अहिल्या और गोनू झा
जाले विधानसभा क्षेत्र का इतिहास ऋषि-मुनियों और लोक कथाओं से जुड़ा है। यह महर्षि गौतम और उनकी पत्नी अहिल्या की तपोस्थली माना जाता है। प्रसिद्ध लोक कथाओं के पात्र गोनू झा का जन्मस्थल भी भरवाड़ा है, जो इसी क्षेत्र में आता है। यहाँ 850 साल पुराना गंगेश्वरनाथ शिवालय और महर्षि याज्ञवल्क्य के समय का जालेश्वरीस्थान भी मौजूद है।
विकास के मुद्दे और वादे
जाले विधानसभा में कुछ ऐसे वादे हैं जो अभी तक पूरे नहीं हुए हैं। इनमें जोगियारा के मरखाही व रविकारा चौर से जल निकासी की व्यवस्था कराना, जाले और सिंहवाड़ा में स्टेडियम का निर्माण कराना, जाले के रतनपुर स्थित शहीद स्थल का विकास करवाना और सिंहवाड़ा में डिग्री कॉलेज की स्थापना शामिल हैं।
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विधायक और मंत्री, जीवेश कुमार का पक्ष
जीवेश कुमार का कहना है कि उन्होंने क्षेत्र में सड़कों का जाल बिछाया है, अस्पताल, प्रशासनिक और स्कूल भवनों का निर्माण कराया है। बिजली की उपलब्धता को बेहतर किया है और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का भी प्रयास किया है।
प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस प्रत्याशी, मस्कूर अहमद उस्मानी का पक्ष
मस्कूर अहमद उस्मानी ने सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने, सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने, युवाओं के लिए ‘करियर काउंसलिंग सेल’ बनाने, किसानों को समय पर खाद-बीज उपलब्ध कराने और मजदूरों के पलायन को रोकने का वादा किया है। उन्होंने क्षेत्र में एक उद्योग स्थापित करने का भी प्रयास करने की बात कही है।
इस बार के चुनाव में देखना होगा कि क्या जीवेश कुमार अपनी हैट्रिक पूरी कर पाते हैं या फिर कोई नया चेहरा सामने आता है।



