थार में ‘हरियाली’ और ‘हरित ऊर्जा’ की जंग: Khejri Trees पर संकट

हरियाली बचाने का बीकानेर के नोखा दैया गांव में शुरू हुआ आंदोलन अब जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, नागौर, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ तक फैल चुका है।

Share This Article:

नई दिल्ली: राजस्थान के थार रेगिस्तान में एक अनोखा संघर्ष छिड़ा है, जहां सौर ऊर्जा के नाम पर सैकड़ों साल पुराने खेजड़ी पेड़ों (Khejri Trees) को काटा जा रहा है। बीकानेर के नोखा दैया गांव में शुरू हुआ आंदोलन अब जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, नागौर, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ तक फैल चुका है। स्थानीय किसान और पर्यावरण प्रेमी सौर ऊर्जा कंपनियों के खिलाफ खड़े हो गए हैं, जो रेगिस्तान की पारिस्थितिकी का आधार कहे जाने वाले खेजड़ी पेड़ों को बेरहमी से काट रही हैं। यह संघर्ष न केवल पर्यावरण की रक्षा का है, बल्कि थार की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को बचाने की लड़ाई भी है।

खेजड़ी: रेगिस्तान की आत्मा
खेजड़ी, राजस्थान का राज्य वृक्ष, केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि थार के जीवन का आधार है। इसकी पत्तियां पशुओं के लिए चारा, सांगरी फल भोजन का हिस्सा, और इसकी छाया रेगिस्तान की तपती धूप में राहत देती है। यह पेड़ मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और जैव विविधता को बनाए रखता है। लेकिन सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर जमीन हासिल करने की होड़ में ये पेड़ तेजी से काटे जा रहे हैं। बीकानेर के पर्यावरणविद् डॉ. प्रदीप शर्मा के अनुसार, पिछले एक दशक में अकेले बीकानेर जिले में लाखों खेजड़ी, केर और रोहिड़ा के पेड़ काटे जा चुके हैं। इससे रेगिस्तान की पारिस्थितिकी खतरे में पड़ गई है।

आंदोलन की शुरुआत
जुलाई 2024 में नोखा दैया के किसान रामस्वरूप जाट को अपने खेत के पास पेड़ काटने की आवाज सुनाई दी। दौड़कर पहुंचने पर उन्होंने देखा कि सौर ऊर्जा कंपनी के कर्मचारी खेजड़ी के पुराने पेड़ों को काट रहे थे। स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता सुमेर सिंह बिश्नोई को बुलाया गया, और गांव वालों ने मिलकर कटाई रोक दी। यह घटना एक बड़े आंदोलन का आधार बनी। गांव-गांव में तंबू गाड़े गए, और किसानों ने दिन-रात धरने शुरू किए। यह विरोध जल्द ही पश्चिमी राजस्थान के अन्य जिलों में फैल गया।

सरकार का रवैया और स्थानीय असंतोष
सितंबर 2024 में, राज्य सरकार ने घोषणा की कि प्रत्येक कटे हुए खेजड़ी पेड़ के बदले 10 नए पेड़ लगाए जाएंगे। लेकिन प्रदर्शनकारी इसे कागजी कार्रवाई मानते हैं। जोधपुर के किसान तेज सिंह कहते हैं, जहां पेड़ काटे गए, वहां सोलर पैनल बिछा दिए गए हैं। अब वहां पेड़ लगाने की जगह ही नहीं बची। इसके अलावा, सौर संयंत्रों को साफ करने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है, जो थार जैसे पानी-दुर्लभ क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती है। शर्मा के अनुसार, बीकानेर के कई क्षेत्रों में जल स्रोत 2015 के 100 से घटकर 2024 में 20 से भी कम रह गए हैं।

वन्यजीवों पर बढ़ता खतरा
सौर परियोजनाओं का असर केवल पेड़ों तक सीमित नहीं है। वन्यजीव विशेषज्ञ राकेश चौधरी ने बताया कि इन परियोजनाओं से ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, काला हिरण, रेगिस्तानी बिल्ली और कई छोटे जीवों की प्रजातियां खतरे में हैं। सौर संयंत्रों की बिजली लाइनें पक्षियों के लिए घातक साबित हो रही हैं। 2025 में लाखूसर गांव में 300 से अधिक खेजड़ी पेड़ काटे जाने की घटना ने आंदोलन को और तेज कर दिया। गांव वालों ने कटाई करने वालों को पकड़ लिया, लेकिन पुलिस ने उल्टा प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की धमकी दी। बिश्नोई समाज के कार्यकर्ता सुमेर सिंह ने कहा, पुराना कानून पेड़ काटने वालों पर सिर्फ 100 रुपये का जुर्माना लगाता है। यह रेगिस्तान की रक्षा नहीं, बल्कि उसका विनाश है।

विकास का वैकल्पिक रास्ता
पर्यावरणविदों का मानना है कि सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए वैकल्पिक रास्ते अपनाए जा सकते हैं। डॉ. शर्मा सुझाव देते हैं, सौर पैनल स्कूलों, सरकारी भवनों या राजस्थान की नहरों पर लगाए जा सकते हैं, जैसा पंजाब में सफलतापूर्वक किया गया है। लेकिन कंपनियों के लिए किसानों की जमीन खरीदना और पेड़ काटना आसान और सस्ता है। सामाजिक कार्यकर्ता मंजू चौधरी कहती हैं, हरित ऊर्जा के नाम पर हरियाली का विनाश स्वीकार्य नहीं है। अगर हम अपनी जैव विविधता खो देंगे, तो भविष्य में भोजन और पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा।

खेजड़ी: सांस्कृतिक धरोहर
खेजड़ी सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर है। 1730 में अमृता देवी बिश्नोई और 362 अन्य लोगों ने खेजड़ी पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राण दिए थे। आज भी बिश्नोई समाज और अन्य समुदाय इस धरोहर को बचाने के लिए एकजुट हैं। नोखा दैया में धरने पर बैठे बुजुर्ग किसान हरिराम ने कहा, हमारी जड़ें इन पेड़ों से जुड़ी हैं। अगर ये कटे, तो हमारा अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। प्रदर्शनकारी एक सख्त वृक्ष संरक्षण कानून की मांग कर रहे हैं, जो खेजड़ी और थार की जैव विविधता को बचाए।

एक अनसुलझा सवाल
थार में हरित ऊर्जा और हरियाली के बीच का यह संघर्ष एक बड़े सवाल को जन्म देता है। क्या विकास और पर्यावरण संरक्षण एक साथ नहीं चल सकते? जब तक सरकार और कंपनियां इस सवाल का जवाब नहीं ढूंढतीं, तब तक थार के किसान और पर्यावरण प्रेमी अपनी धरती और धरोहर को बचाने के लिए सड़कों पर उतरते रहेंगे।

NewG Network

contact@newgindia.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें

कैटेगरीज़

हम वह खबरची हैं, जो खबरों के साथ खबरों की भी खबर रखते हैं। हम NewG हैं, जहां खबर बिना शोरगुल के है। यहां news, without noise लिखी-कही जाती है। विचार हममें भरपूर है, लेकिन विचारधारा से कोई खास इत्तेफाक नहीं। बात हम वही करते हैं, जो सही है। जो सत्य से परामुख है, वह हमें स्वीकार नहीं। यही हमारा अनुशासन है, साधन और साध्य भी। अंगद पांव इसी पर जमा रखे हैं। डिगना एकदम भी गवारा नहीं। ब्रीफ में यही हमारा about us है।

©2025 NewG India. All rights reserved.