नई दिल्ली: इंटरनेशनल टाइगर डे 2025 के अवसर पर भारत ने बाघ संरक्षण में वैश्विक नेतृत्व हासिल किया है। 2025 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 3,682 बाघ हैं, जो विश्व के 75% बाघों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह संख्या 2006 के 1,411 से दोगुनी से अधिक है। रूस (लगभग 750 साइबेरियन टाइगर) और चीन (केवल 20 बाघ) की तुलना में भारत की उपलब्धि उल्लेखनीय है। आइए जानते हैं, भारत ने यह मुकाम किन पांच प्रमुख कारणों से हासिल किया।
प्रोजेक्ट टाइगर की रणनीति
1973 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट टाइगर भारत की सबसे सफल संरक्षण पहल है। इसके तहत 58 टाइगर रिजर्व बनाए गए, जो 75,796 वर्ग किलोमीटर में फैले हैं। कैमरा ट्रैप और डीएनए विश्लेषण जैसी तकनीकों ने बाघों की सटीक गणना और उनके आवासों की सुरक्षा सुनिश्चित की। सरकारी बजट में वृद्धि और रणनीतिक योजना ने बाघों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सख्त कानूनी ढांचा
वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972 के तहत बाघों का शिकार पूरी तरह प्रतिबंधित है। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) और वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो ने शिकार और अवैध व्यापार पर कड़ी निगरानी रखी। रूस और चीन में कानून हैं, लेकिन भारत में इनका प्रभावी कार्यान्वयन बाघ संरक्षण को मजबूत करता है।
स्थानीय समुदायों का सहयोग
भारत ने स्थानीय समुदायों को संरक्षण में भागीदार बनाया। बाघ पर्यटन से रोजगार और मुआवजा योजनाओं ने ग्रामीणों को बाघों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण बनाया। रूस और चीन में ऐसी भागीदारी सीमित है, जिससे भारत को बढ़त मिली।
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आवास संरक्षण और कॉरिडोर
जंगलों की कटाई और अवैध खनन पर नियंत्रण के साथ, भारत ने बाघों के लिए सुरक्षित कॉरिडोर बनाए। ये कॉरिडोर बाघों को एक क्षेत्र से दूसरे में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करते हैं। रूस और चीन में आवास सिकुड़ने से बाघों की संख्या प्रभावित हुई।
शिकार और अवैध व्यापार पर रोक
भारत ने बाघों के अंगों के अवैध व्यापार पर सख्ती से रोक लगाई। अंतरराष्ट्रीय सहयोग और खुफिया निगरानी ने शिकार को कम किया। चीन में पारंपरिक दवाओं की मांग और रूस में भौगोलिक चुनौतियों ने संरक्षण को मुश्किल बनाया।



