नई दिल्ली: मोबाइल से पेमेंट करते, गाड़ी चलाते या फिर फ्लाइट से चंद घंटों में हजारों किलोमीटर की दूरियां नापते हुए हमें शायद ही आधे इंच की एक चीज का ख्याल आया हो, जिसका तेजी से डिजिटल होती दुनिया में हर तरफ दखल है। लैपटॉप से लेकर फिटनेस बैंड तक और महीन कंप्यूटिंग मशीन से लेकर मिसाइल तक में आज एक ही चीज धड़क रही है- दुनिया इसे सेमीकंडक्टर या माइक्रोचिप कहती है।
सिलिकॉन से बनी इस बेहद छोटी चिप की अहमियत का अहसास तब होता है, जब दुनिया भर में गाड़ियों का उत्पादन थम जाता है, मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट महंगे हो जाते हैं, डेटा सेंटर डगमगाने लगते हैं, घरेलू अप्लायंस के दाम आसमान छूने लगते हैं, नए एटीएम लगने बंद हो जाते हैं और अस्पतालों में जिंदगी बचाने वाली टेस्टिंग मशीनों का आयात रुक जाता है।
कोविड के उफान के दिनों में जब इन सेमीकंडक्टर्स या माइक्रोचिप्स की सप्लाई धीमी हो गई थी तो दुनिया भर के लगभग 169 उद्योगों में हड़कंप मच गया था। दिग्गज कंपनियों के अरबों डॉलरों का नुकसान उठाना पड़ा था। चीन, अमेरिका और ताइवान जैसे माइक्रोचिप्स के सबसे बड़े निर्यातक देशों की कंपनियों को भी प्रोडक्शन रोकना पड़ा था।
भविष्य में यह संकट न आए, भारत इसके लिए संजीदगी से प्रयास कर रहा है। 76,000 करोड़ रुपये की फंडिंग से दिसंबर 2021 में सेमीकंडक्टर इंडिया प्रोग्राम को लॉन्च किया था। इस दिशा में आगे कदम बढ़ाते हुए मई 2025 में यूपी के नोएडा में देश की छठीं सेमीकंडक्टर युनिट की नींव रखीा गई है।
इलेक्ट्रॉनिक इकोनॉमी बनने की राह पर बढ़ रहा भारत
एक समय था, जब देश की जीडीपी में कृषि मुख्य घटक थी। धीरे-धीरे हमने सर्विस सेक्टर में प्रगति की और जीडीपी में उसका योगदान बढ़ा। बदलते परिवेश में मैन्युफैक्चरिंग की जीडीपी में हिस्सेदारी बढ़ाने की आवश्यकता स्पष्ट रूप से देखी जा रही है। चीन की चुनौतियों का सामना करना है, तो हमें मैन्यूफैक्चरिंग का हब बनकर सामने आना ही होगा। इस दिशा में महत्वपूर्ण कड़ी है इलेक्ट्रानिक्स। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए 2020 में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को लेकर प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) की घोषणा की गई थी।
नतीजा यह रहा कि कभी पूरी तरह आयात पर निर्भर रहने वाले भारत में सालाना 28 करोड़ यूनिट मोबाइल फोन का निर्माण होने लगा। इन सालों में इलेक्ट्रानिक्स के निर्यात में भी हमने बड़ी तरक्की की है। हम एक इलेक्ट्रॉनिक इकोनॉमी बनने की राह पर बढ़ रहे हैं। और हम इलेक्ट्रॉनिक इकोनॉमी तभी बनेंगे, जब हमारा सेमीकंडक्टर उद्योग मजबूत होगा। और सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री मजबूत कैसे हो रही है, इसे नीचे के लिंक को क्लिक करके समझा जा सकता है।
सेमीकंडक्टर का विज्ञान
प्रकृति में कुछ पदार्थ ऐसे हैं, जो तुरंत ही अपने में से होकर विद्युत को प्रवाहित होने देते हैं। जबकि कुछ अन्य के साथ ऐसा नहीं होता। जिनसे आसानी से विद्युत प्रवाहित हो जाती है, उनको सुचालक, Conductor कहते हैं। इनमें ऐसे वैद्युत आवेश यानि इलेक्ट्रॉन होते हैं, जो पदार्थ के भीतर गति के लिए अपेक्षाकृत स्वतंत्र हैं। आवेश के प्रवाह की दर ही विद्युत धारा है। धातुएं, मानव तथा जंतु शरीर और पृथ्वी चालक हैं। कांच, पोर्सेलेन, प्लास्टिक, नॉयलोन, लकड़ी जैसी अधिकांश अधातुएं अपने से होकर प्रवाहित होने वाली विद्युत पर उच्च प्रतिरोध लगाती हैं। इन्हें कुचालक, Insulator कहते हैं। विद्युत प्रवाह के लिहाज से ज्यादातर पदार्थ इन दो वर्गों में से किसी एक में आते हैं। तीसरी श्रेणी अर्धचालकों, Semiconductor की है। इसमें आवेश के प्रवाह बाधित रहता है। मतलब, सुचालक और कुचालक का यह गुण लिए होते हैं।
यूं होता आवेश प्रवाहित
जब किसी चालक पर आवेश स्थानांतरित होता है तो वह तुरंत उस चालक के पृष्ठ पर फैल जाता है। इसके विपरीत यदि कुछ आवेश किसी विद्युतरोधी को दें, तो वह वहीं पर रहता है। इसे समझने के लिए हमें पदार्थ के भीतर की संरचना पर बात करनी पड़ेगी। असल में, हर पदार्थ में कुछ ऐसी चीजें होती हैं, जिनसे उनकी प्रकृति तय होती है। यहां बात सिर्फ तीन चीजों की, जिनसे सुनिश्चित होता है कि पदार्थ सुचालक है, कुचालक या अर्धचालक। और वह तीन चीजें हैं; कंडक्शन बैंड, बैलेंस बैंड और इनको जोड़ने वाला बैंड गैप।
कंडक्शन बैंड में इलेक्ट्रॉन तुलनात्मक तौर पर मुक्त होते हैं। तभी इसमें प्रवाह बना रहता है। वहीं, बैलेंश बैंड में आपस में बंधे होते हैं। आवेश का प्रवाह बैलेंस बैंड से कंडक्शन बैंड की तरफ होता है। यह इस पर निर्भर करता है कि बैंड गैप कितना चौड़ा है। अगर यह संकरा है तो इलेक्ट्रॉन का प्रवाह आसानी हो जाता है। इसकी चौड़ाई ज्यादा होने पर प्रवाह संभव होता। पहला पदार्थ सुचालक और दूसरा कुचालक होता है।
सेमीकंडक्टर इनके बीच है। इसमें बैंड गैप न ज्यादा चौड़ा होता है और न ही संकरा। लेकिन यह इतना होता है कि सामान्य अवस्था में इलेक्ट्रान का प्रवाह नहीं हो पाता। इसके लिए उसे अतिरिक्त ऊर्जा देनी पड़ती है। इससे इलेक्ट्रॉन गैप का जंप कर जाता है और विद्युत प्रवाहित होने लगती है। प्रवाह के क्रम में जब अतिरिक्त ऊर्जा खर्च हो जाती है तो वह दोबारा बैलेंस बैंड में पहुंच जाता है। मतलब यह कि सेमीकंडक्टर में विद्युत प्रवाह का नियंत्रित किया जा सकता है। इसका यही गुण इसे खास बना देता है। चूंकि हम-आप जिस इलक्ट्रानिक गैजेट्स का इस्तेमाल करते हैं, उनके जरिए नियंत्रित संदेश ही भेजना होता है। तभी इनको तैयार करने में सेमीकंडक्टर का इस्तेमाल होता है।
अर्धचालक के गुण
- अर्धचालक पदार्थ की प्रतिरोधकता कुचालक पदार्थ से अधिक और सुचालक से कम होती है।
- अर्धचालकों में प्रतिरोध का ऋणात्मक तापमान गुणांक होता है अर्थात तापमान में वृद्धि के साथ अर्धचालक का प्रतिरोध घटता है और विद्युत चालकता बढती है।
- जब एक उपयुक्त धातु की अशुद्धता अर्धचालक में डाली जाती है तो अर्धचालकों के वर्तमान गुण में बदलाव होता है। अर्थात इनकी चालकता कम या ज्यादा हो जाती है।
- जब अर्धचालक अपनी Natural State में होते हैं तो वे ख़राब सुचालक की भांति व्यवहार करते है, लेकिन कुछ तकनीकी की मदद से अर्धचालकों में धारा का प्रवाह किया जाता है। जैसे कि डोपिंग तकनीकी के द्वारा।
- अर्धचालकों की चालकता को बाहर से लगाये गए विद्युत क्षेत्र या प्रकाश के द्वारा भी परिवर्तित किया जा सकता है।
अर्धचालक के उपयोग
- ट्रांजिस्टर, डायोड, इंटिग्रेटेड सर्किट आदि युक्तियों को बनाने में अर्धचालक का इस्तेमाल किया जाता है।
- बिजली के सिस्टम, पॉवर ट्रांसमिशन बनाने में भी अर्धचालक का इस्तेमाल होता है।
- ऑप्टिकल सेंसर में सहायक उपकरणों को बनाने के लिए भी अर्धचालकों का इस्तेमाल किया जाता है।
अर्धचालक के फायदे
- अर्धचालकों को Heat (गर्म) करने की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि अर्धचालक उपकरणों में कोई फिलामेंट नहीं होता है.
- सर्किट को चालू करने पर अर्धचालक उपकरण तुरंत काम करना शुरू कर देते हैं, क्योंकि इन्हें गर्म करने की जरुरत नहीं पड़ती है.
- अर्धचालक उपकरणों को कम वोल्टेज की आवश्यकता पड़ती है.
- वैक्यूम ट्यूबों की तुलना में अर्धचालक सस्ते होते हैं।
सेमीकंडक्टर चिप
इतना सब बताने का मतलब यह हुआ कि सेमीकंडक्टर वह पदार्थ होता है जिसमें एक विद्युत सुचालक और एक कुचालक के बीच के गुण होते हैं। इसका प्रमुख काम विद्युत प्रवाह को नियंत्रित करना होता है। यह शुद्ध तत्वों से, आम तौर सिलिकॉन से बनता है। इसमें सुचालक के गुणों में बदलाव लाने के लिए कुछ विशेष तरह की अशुद्धता मिलाई जाती है, जिसे डोपिंग कहते हैं। डोपिंग से ही सेमीकंडक्टर के वांछनीय गुण विकसित हो पाते हैं। इसी पदार्थ का उपयोग कर एक छोटा सा विद्युत सर्किट बनाया जाता है जिसे चिप कहते हैं।
इसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का दिमाग समझ सकते हैं। कंप्यूटर, लैपटॉप, कार, वॉशिंग मशीन, ATM, अस्पतालों की मशीन से लेकर हाथ में मौजूद स्मार्टफोन तक सेमीकंडक्टर चिप पर ही काम करते हैं। ये चिप एक दिमाग की तरह इन गैजेट्स को ऑपरेट करने में मदद करती है। जैसे, जब आप कार में बैठे होते हैं और आपकी सीट बेल्ट खुली होती है तो इसकी सूचना आपको चिप से ही मिलती है। यूं ही, स्मार्ट वॉशिंग मशीन में कपड़े पूरी तरह धुलने के बाद ऑटोमैटिक मशीन बंद हो जाती है। यह सब सेमीकंडक्टर चिप की ही मदद से ही होता है।




