नई दिल्ली: जब बच्चा मां के गर्भ में होता है, तो वह नाक या मुंह से सांस नहीं लेता। इसके बजाय, उसे ऑक्सीजन गर्भनाल (Umbilical Cord) के माध्यम से मिलती है। गर्भनाल मां के रक्त से ऑक्सीजन और पोषक तत्वों को बच्चे तक पहुंचाती है। बच्चे के फेफड़े गर्भावस्था के शुरुआती चरणों में विकसित होने लगते हैं, लेकिन वे पूरी तरह कार्यात्मक तभी बनते हैं, जब गर्भावस्था का तीसरा चरण (Third Trimester) शुरू होता है।
इस दौरान फेफड़ों में छोटी-छोटी हवा की थैलियां, जिन्हें एल्वियोली (Alveoli) कहा जाता है, बनना शुरू होती हैं। ये थैलियां ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के आदान-प्रदान के लिए जरूरी होती हैं। अगर एल्वियोली का विकास ठीक नहीं होता, तो जन्म के बाद बच्चे को सांस लेने में परेशानी हो सकती है। गर्भ में बच्चे के फेफड़े तरल पदार्थ से भरे होते हैं, जो जन्म के समय बाहर निकलता है।
जन्म के बाद बच्चा पहली सांस कब लेता है?
जन्म के बाद बच्चा आमतौर पर कुछ सेकंड के भीतर अपनी पहली सांस लेता है। सामान्य रूप से स्वस्थ बच्चे जन्म के 10 सेकंड के अंदर सांस लेना शुरू कर देते हैं। यह प्रक्रिया हार्मोनल बदलाव, डिलीवरी के दौरान शारीरिक दबाव, तापमान में परिवर्तन और हवा के संपर्क से शुरू होती है।
पहली सांस के साथ बच्चे के फेफड़े फूलते हैं, और उनमें भरा तरल पदार्थ बाहर निकल जाता है। यह तरल निकलने के बाद फेफड़े ऑक्सीजन ग्रहण करना शुरू करते हैं, और रक्त प्रवाह फेफड़ों से होकर ऑक्सीजन को पूरे शरीर में पहुंचाता है। इस शुरुआती सांस को अक्सर “हांफना” कहा जाता है, क्योंकि बच्चे का तंत्रिका तंत्र नए वातावरण के प्रति प्रतिक्रिया देता है।
पहली सांस का महत्व
पहली सांस बच्चे के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल उसे स्वतंत्र रूप से ऑक्सीजन लेने में सक्षम बनाती है, बल्कि फेफड़ों को पूरी तरह कार्य करने के लिए तैयार करती है। जन्म के समय डॉक्टर यह सुनिश्चित करते हैं कि बच्चा ठीक से सांस ले रहा है, क्योंकि सांस लेने में देरी या दिक्कत गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकती है।



