नई दिल्ली: मृत्यु को हमेशा जीवन का अंत माना गया है, लेकिन इतिहास में कई बार मरे हुए लोगों को जिंदा करने की कोशिशें हुई हैं। प्राचीन काल में ऐसी कहानियां सुनने को मिलती थी, जहां धार्मिक या चमत्कारी दावों के साथ मृतकों को जीवित करने की बात कही गई, लेकिन इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। आधुनिक युग में मेडिकल साइंस और तकनीक ने इस दिशा में कई प्रयोग किए हैं। खास तौर पर क्रायोनिक्स और अन्य चिकित्सीय तकनीकों ने मृत्यु की परिभाषा को चुनौती दी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में मृतकों को जिंदा करना संभव हो सकता है, जैसे सौ साल पहले चांद पर पहुंचना असंभव लगता था।
क्रायोनिक्स: मृत शरीर को संरक्षित करने की तकनीक
अमेरिका में क्रायोनिक्स तकनीक के जरिए मृतकों को जिंदा करने की कोशिशें हो रही हैं। इस तकनीक में मृत शरीर को अत्यधिक ठंडे तापमान (-196 डिग्री सेल्सियस) में तरल नाइट्रोजन में संरक्षित किया जाता है, ताकि भविष्य में उन्नत तकनीक से उन्हें जीवित किया जा सके। एरिजोना के एक रिसर्च सेंटर में कई शव इस उम्मीद में रखे गए हैं। 1967 में जेम्स बेडफोर्ड पहला व्यक्ति थे, जिन्हें क्रायोनिक्स के जरिए संरक्षित किया गया। हालांकि, अभी तक किसी भी मानव को इस तकनीक से जीवित नहीं किया जा सका है। एक प्रयोग में खरगोश के दिमाग को क्रायोनिक्स से संरक्षित कर सुरक्षित रखा गया, लेकिन मानव दिमाग को पुनर्जनन करना अभी असंभव है।
चिकित्सीय प्रयास और सफलताएं
आधुनिक चिकित्सा में कुछ मामलों में मृत घोषित लोगों को पुनर्जनन किया गया है। उदाहरण के लिए, 2013 में ऑस्ट्रेलिया के अल्फ्रेड अस्पताल में 30 वर्षीय कॉलिन फीडलर को हृदयाघात के 40 मिनट बाद ऑटो पल्स मशीन और एक्स्ट्रा-कॉरपोरियल मेंब्रेन ऑक्सीजनेशन (ECMO) तकनीक से जीवित किया गया। इस तकनीक से सात अन्य मरीजों को भी बचाया गया। यह सफलता तब संभव हुई जब मृत्यु के छह मिनट के भीतर ऑक्सीजन और रक्त प्रवाह बहाल किया गया। न्यूयॉर्क के डॉक्टरों का कहना है कि मृत्यु के तुरंत बाद विशेष ऑपरेशन से कुछ मामलों में जीवन लौटाया जा सकता है।
चुनौतियां और भविष्य
क्रायोनिक्स और अन्य तकनीकों की सफलता सीमित है। वैज्ञानिकों का एक वर्ग इसे अव्यावहारिक मानता है, क्योंकि मृत्यु के बाद कोशिकाएं अपरिवर्तनीय रूप से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। फिर भी, मेडिकल साइंस में प्रगति ने उम्मीद जगाई है कि भविष्य में मृत्यु को टाला जा सकता है।



