नई दिल्ली: पानी में बढ़ता प्रदूषण आज वैश्विक स्तर पर एक गंभीर समस्या बन चुका है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिक गतिविधियों और दवाओं के अंधाधुंध उपयोग ने नदियों, झीलों और भूजल को जहरीला बना दिया है। इस चुनौती से निपटने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गुवाहाटी (IIT-Guwahati) ने एक अभूतपूर्व नैनोसेंसर विकसित किया है, जो महज 10 सेकंड में पानी में मौजूद खतरनाक प्रदूषकों जैसे पारा (मरकरी) और टेट्रासाइक्लिन एंटीबायोटिक की पहचान कर सकता है। यह तकनीक न केवल पर्यावरण संरक्षण में मील का पत्थर साबित हो सकती है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
नैनोसेंसर की अनूठी खासियत
IIT गुवाहाटी के रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर लाल मोहन कुंडू के नेतृत्व में शोधार्थी पल्लवी पॉल और अनुष्का चक्रवर्ती ने इस नैनोसेंसर को दूध के प्रोटीन और थायमिन (एक डीएनए बिल्डिंग ब्लॉक) से बनाया है। यह सेंसर कार्बन डॉट्स पर आधारित है, जो पराबैंगनी (UV) प्रकाश में चमकते हैं। जब यह सेंसर पारा या टेट्रासाइक्लिन जैसे प्रदूषकों के संपर्क में आता है, तो इसकी चमक तुरंत मंद पड़ जाती है, जो प्रदूषण की मौजूदगी का स्पष्ट संकेत देती है। इसकी संवेदनशीलता इतनी अधिक है कि यह 5.3 नैनोमोलर (1.7 पार्ट्स प्रति बिलियन) पारे और 10^-13 नैनोमोलर टेट्रासाइक्लिन का पता लगा सकता है, जो अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) के सुरक्षा मानकों से भी कम है।
क्यों जरूरी है यह खोज?
पारा, विशेष रूप से इसके जैविक रूप में, कैंसर, तंत्रिका तंत्र की बीमारियां और हृदय रोग जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। वहीं, टेट्रासाइक्लिन एक सामान्य एंटीबायोटिक है, जिसका उपयोग निमोनिया और सांस की बीमारियों के इलाज में होता है। अगर इसका निपटान ठीक से न किया जाए, तो यह पानी में मिलकर एंटीबायोटिक प्रतिरोध और अन्य स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। प्रोफेसर कुंडू ने बताया, “पानी और जैविक तरल पदार्थों में इन प्रदूषकों का पता लगाना बेहद जरूरी है। हमारा सेंसर न केवल इनकी अति सूक्ष्म मात्रा को पकड़ सकता है, बल्कि इसका उपयोग चिकित्सा निदान में भी संभव है।”
उपयोग में आसानी और बहुमुखी प्रतिभा
इस नैनोसेंसर को और अधिक उपयोगी बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने इसे पेपर स्ट्रिप्स पर कोट किया है, जिससे एक साधारण UV लैंप की मदद से कहीं भी तुरंत पानी की जांच की जा सकती है। इसकी प्रभावशीलता को नल के पानी, नदी के पानी, दूध, मूत्र और सीरम जैसे विभिन्न नमूनों में सफलतापूर्वक परखा गया है। यह तकनीक सस्ती, पर्यावरण-अनुकूल और जैव-संगत होने के कारण भविष्य में चिकित्सा और पर्यावरण निगरानी के क्षेत्र में क्रांति ला सकती है।
शोध का वर्तमान और भविष्य
यह शोध माइक्रोकेमिका एक्टा नामक प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जो इसकी वैज्ञानिक विश्वसनीयता को दर्शाता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह तकनीक अभी प्रयोगशाला स्तर पर है और इसके व्यावसायिक उपयोग से पहले और सत्यापन की जरूरत है। फिर भी, इसकी कम लागत, उच्च सटीकता और त्वरित परिणाम देने की क्षमता इसे वैश्विक स्तर पर स्वच्छ जल की चुनौती से निपटने का एक आशाजनक समाधान बनाती है।
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भारत और विश्व के लिए महत्व
भारत जैसे देश में, जहां गंगा और यमुना जैसी नदियां प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रही हैं, यह नैनोसेंसर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता की निगरानी को आसान बना सकता है। वैश्विक स्तर पर, खासकर विकासशील देशों में, जहां स्वच्छ पानी की कमी एक बड़ी चुनौती है, यह तकनीक एक किफायती और प्रभावी समाधान प्रदान कर सकती है। यह न केवल पर्यावरण की रक्षा करेगा, बल्कि लाखों लोगों को स्वास्थ्य जोखिमों से भी बचाएगा। IIT गुवाहाटी का यह नैनोसेंसर पानी की गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा में एक बड़ा कदम है। यह तकनीक न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया के लिए स्वच्छ और सुरक्षित पानी सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।



