पटना: दिन 11 अक्टूबर और जगह राघोपुर! प्रशांत किशोर अपनी चुनावी जनसभा की शुरुआत करते हैं राजद के गढ़ से। इस दौरान तेजस्वी को ललकारते हैं और कहते हैं जो हाल राहुल गांधी का अमेठी में हुआ था, वो हाल तेजस्वी यादव का राघोपुर में होगा। जैसे राहुल अमेठी छोड़कर भागते हैं वैसे ही तेजस्वी अपने लिए दूसरी सीट ढूंढने लगे हैं। राघोपुर में दहाड़ने के 4 दिन बाद ही प्रशांत किशोर चुनाव लड़ने से इंकार कर देते हैं। आइये जानते हैं आखिर प्रशांत किशोर तेजस्वी के सामने से क्यों मैदान छोड़कर भाग गए…
पीके पीछे हटे
15 अक्टूबर को प्रशांत किशोर ने ऐलान किया, वो चुनाव नहीं लड़ेंगे। उनका कहना था पार्टी ने तय किया है कि मैं चुनाव न लड़ूं। इससे पार्टी के प्रत्याशियों को नुकसान हो सकता है। उनका ध्यान पार्टी को 150 सीट जिताने पर है। लेकिन पीके के इस दावे में कितना दम है वो उदाहरण से समझेंगे तो पीएम मोदी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 206 रैलियां की। 80 के करीब इंटरव्यू किए। इसके बाद भी वाराणसी से लड़े और जीते। राहुल गांधी ने भी इसी तरह 75 रैलियां की। इसके बाद भी रायबरेली और वायनाड से जीत दर्ज की। तेजस्वी यादव का उदहारण लें तो वो इस वक़्त पार्टी के इकलौते प्रचारक हैं। लालू और राबड़ी पूरी तरह एक्टिव नहीं है। इसके बाद भी 2020 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव 247 रैलियां और 4 रोड शो करते हैं और राघोपुर से चुनाव जीतते भी हैं।
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क्या कह रहे सियासी जानकार
प्रशांत किशोर के चुनाव न लड़ने पर राजनीतिक जानकार तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। सियासी जानकारों की माने तो जन सुराज में पीके सबसे बड़ा चेहरा हैं। अगर वो हार जाते तो पार्टी के भविष्य को लेकर कई तरह के सवाल उठाते। चुनावी रणनीति बनाने में माहिर प्रशांत किशोर ने जमीनी फीडबैक लिया होगा और शायद उन्हें पॉजिटिव रिस्पांस न मिला हो। पहले ही चुनाव में पार्टी इतना बड़ा रिस्क नहीं लेना चाहती हो। इसके लिए भी हम उदहारण से समझेंगे- राजद से अलग होकर पप्पू यादव ने जन अधिकार पार्टी बनाई थी। 2019 लोकसभा चुनाव में उतरे। एक भी सीट नहीं मिली और खुद भी हार गए। ऐसे ही 2020 विधानसभा चुनाव में पुष्पम प्रिया चौधरी ने ‘द प्लुरल्स पार्टी’ बनाई थी। 102 पर चुनाव लड़ी और एक भी नहीं जीत पाई। खुद पुष्पम प्रिय चौधरी दो जगह बांकीपुर और बिस्फी से मैदान में उतरी लेकिन जीत नहीं पाई। प्रशांत किशोर भी फूंक फूंक कर कदम उठाना चाहते हैं।



