कापी किताब की जगह बच्चों के हाथ में पहुंच रहे हथियार

कलम-कापी थामने वाले हाथ अगर चाकू उठाने लगें, तो संकट पीढ़ीगत है। इसका मूल शिक्षा व्यवस्था तक जाता है। वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र नाथ राय की रिपोर्ट..

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लखनऊ: मामले ढेर सारे हैं, जिनसे अखबारों के पन्ने हर दिन रंगे होते हैं, लेकिन जिक्र यहां दो का ही है। इससे हालात खराब होते जाने की तस्वीर स्पष्ट होती है।

गाजीपुर के सनबीम स्कूल में नौवीं कक्षा का एक छात्र छोटी सी बात पर दसवीं कक्षा के छात्र की हत्या कर देता है। परिजन आक्रोशित हैं। कभी मशाल जुलूस निकाल रहे हैं, कभी प्रदर्शन कर रहे हैं। यूं ही, गुजरात के अहमदाबाद की भी एक घटना है। पीड़ित परिजनों ने वहां स्कूल में तोड़फोड़ कर अपनी नाराजगी जताई।

सवाल बड़ा यही है कि इसमें दोष किसका है। कलम-किताब उठाने की उम्र में बच्चे चाकू क्यों उठाने लगे हैं? बैग में किताबों की जगह चाकू और कट्टा लेकर जाने लगे है? यह समाज के हर हिस्से की साझी चिंता का विषय है। इसकी तह में जाने पर जो एक बात समझ में आती है, वह हमारे पूरे एजूकेशन सिस्टम पर सवालिया निशान लगाती है। समाजशास्त्री भी इसको शिक्षा प्रणाली में आई विसंगतियों को जिम्मेदार ठहरा रहा है। बतौर अभिभावक हम खुद को भी बरी नहीं कर सकते। दिक्कत अभिभावकों के छोर पर भी है।

एक दौर वह भी था, जब स्कूल में अध्यापक बगैर किसी संकोच के बच्चों को झिड़क देते थे। कई बार मार भी पड़ जाती थी। थोड़ी भी गलती रही, होम वर्क नहीं हुआ तो निश्चय ही डंडा खाने के लिए तैयार रहना पड़ता था। वहीं, यदि स्कूल से थोड़ी शिकायत पापा के पास आ जाय तो यहां भी झिड़की ही मिलती थी। जबकि अब डंडा तो दूर बच्चों को डांटना भी कठिन हो गया है। कब वे गलत कदम उठा लें, यह कहा नहीं जा सकता। बच्चों का डरना तो दूर अभिभावक खुद अपने बच्चों से डरे रहते हैं।

एक्सपर्ट की नजर में ट्रेंड समझते हैं

  • इसके प्रति चकाचौंध की दुनिया है, जिसमें अभिभावक अपने बच्चों को नैतिकता का ज्ञान देने में असफल हो चुके हैं। हर अभिभावक सिर्फ बच्चे को किताबी कीड़ा बनाना चाहता है। वह दादा की कहानियां तो बहुत पहले ही फुर्र हो गयी थीं। वहीं पहले स्कूल में नैतिक शिक्षा की भी एक किताब चलती थी। अब वह भी समाप्त हो चुकी है। बालपन में बच्चों को सदाचार की शिक्षा दी जाए तो वह आजीवन नहीं भूलता, लेकिन वह सदाचार वाली कहानियां किताबों और परिवार से गायब हो चुकी हैं। किताबों का कीड़ा बनते-बनते बच्चे चिड़चिड़ा होने लगे हैं। छोटी-छोटी बातों पर उन्हें गुस्सा आ जाता है। डा. विकास कुमार, समाजशास्त्री

स्कूलों में अब अध्यापक-छात्र में गुरु-शिष्य परंपरा ही समाप्त प्राय हो गयी है। शिक्षा सिर्फ व्यवसाय बनकर रह गया है। इससे नैतिकता में काफी गिरावट आयी है। सरकार की नीतियों में आये बदलाव भी कुछ हद तक इसके लिए दोषी हो सकता है। पहले गुरु जी बच्चे को डंडे से पिटते थे, अभिभावक उनसे कुछ नहीं कहता, उल्टे घर पर भी मार पड़ती थी। इससे एक फायदा तो अवश्य था कि बच्चे में सहनशक्ति बढ़ती थी। उसे मार खाने के बाद भी गुस्सा नहीं आता। अब अध्यापक बच्चे को डांट भी नहीं सकता है। सिद्धार्थ शंकर राय, पदाधिकारी, गाजीपुर अभिभावक संघ

  • बच्चों को शिक्षा से पूर्व नैतिकता और धार्मिक प्रवृति का ज्ञान कराना जरूरी हो गया है। आखिर हमारे बुढ़ापे की लाठी ही खत्म हो गयी तो फिर ऐसे में हमें अपनी संस्कृति पर विचार करना और पुरानी पद्धति की ओर लौटना जरूरी हो गया है। भारतेंदू पाठक, अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, प्रयागराज

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