पटना: बिहार में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई है। सभी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। इस बीच, बिहार के छात्र नेताओं की निगाहें भी टिकटों की दौड़ पर टिकी हैं, जो अपनी सियासी जमीन तलाशने की उम्मीद में हैं। हालांकि, 2020 के विधानसभा चुनाव में किसी भी प्रमुख दल ने छात्र नेताओं को टिकट नहीं दिया था, और अब 2025 के चुनाव के लिए सर्वे और स्क्रीनिंग टीमों के रुझानों को देखकर लगता है कि इस बार भी प्रमुख दल छात्र नेताओं को दरकिनार करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बिहार की सियासत में युवा और छात्र नेताओं को मौका मिलेगा, या एक बार फिर अनुभव और पुराने चेहरों पर ही भरोसा जताया जाएगा?
छात्र राजनीति का केंद्र है पटना विवि
छात्र राजनीती की बात करें तो उसका केंद्र पटना विश्वविद्यालय है। पटना विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष रहे लालू यादव बिहार के सीएम बने और छात्र राजनीती करने वाले नीतीश कुमार पिछले 20 साल से मुख्यमंत्री पद पर काबिज है। इसके अलावा लालू मंत्रीमंडल से लेकर नीतीश मंत्रीमंडल तक पटना विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं का दबदबा रहा। वर्ष 1974 के छात्र आंदोलन के बाद पटना विश्वविद्यालय के चर्चित छात्र नेताओं को सभी दल टिकट देने से नहीं झिझकते थे, लेकिन पिछले दो चुनाव से इस मामले में बहुत कमी देखने को मिली है। इससे छात्र नेताओं में निराशा है।
हर चुनाव में छात्र नेता बढ़चढ़ कर भाग लेते हैं
अब सवाल उठता है कि छात्र संघ और छात्र राजनीति से निकले नेता क्या आज देश और राज्य की राजनीति में अहम भूमिका निभा रहे हैं। जवाब शून्य मिलता है। इस संबंध में कई छात्र नेताओं और जानकारों से बात की गई सभी की बातो से निचोड़ निकलता है कि परिवारवाद और आर्थिक बोझ छात्र नेताओं को टिकट मिलने में रोड़ा है।
पटना विश्वविद्यालय के आइसा संगठन के छात्र नेता रहे तारिक अनवर बताते हैं लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद सहित दर्जनों ऐसे छात्र नेता रहे हैं जो आज बड़े नेता के रूप में स्थापित हैं लेकिन अभी जो स्थिति है उसमें छात्र नेताओं को कोई वैल्यू नहीं दी जाती है। उसकी मुख्य वजह कहीं ना कहीं परिवारवाद और अपनों को पार्टी में जगह देना है। भले ही उनमें राजनीति की समझ न हो, लेकिन नेताओं के परिवार ही एमपी, एमएलसी बनते हैं। यह स्थिति कमोबेश सभी दलों में है। यही वजह है कि छात्र स्तर से राजनीति करने के बाद भी उन्हें सही जगह नहीं मिल पाती है।
लगभग 28 सालों के बाद 2012 में पटना विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव करवाया गया। तब पुसू अध्यक्ष पद पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से आशीष सिन्हा जीते थे। अभी वह बीजेपी में युवा मोर्चा में हैं, पार्टी ने उन्हें उस स्तर से आगे नहीं बढ़ाया और इस साल भी टिकट मिलना मुश्किल है।
2018 में दिव्यांशु भारद्वाज निर्दलीय छात्र संघ के अध्यक्ष बने बाद में जेडीयू में शामिल हुए, पार्टी की ओर से उन्हें युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया। जदयू से उन्हें अभी तक उन्हें यह आश्वासन नहीं मिला है कि उनको टिकट मिलेगा या नहीं। हालांकि दिव्यांशु अपनी सियासी जमीन मोतिहारी में तैयार कर रहे हैं।
2019 में मोहित प्रकाश जेडीयू से पुसू अध्यक्ष बने, जदयू पार्टी ने उनको कभी आगे नहीं किया और टिकट तो दूर की बात है।
2020 में पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी से मनीष यादव अध्यक्ष बने। वह पार्टी कांग्रेस में विलय कर दी गई, लेकिन वह पप्पू यादव के साथ लगे हुए हैं। जाप पार्टी रहती तो शायद टिकट मिलने की उम्मीद भी होती। 2022 में जेडीयू के आनंद मोहन पुसू छात्र संघ के अध्यक्ष बने। पार्टी ने उन्हें सम्मान दिया, लेकिन चुनावी राजनीती में सम्मान नगण्य मिलता दिख रहा है।
वहीं 2012 में उपाध्यक्ष पद पर AISF से अंशुमान जीते थे जो राजनीति छोड़कर अभी वकालत कर रहे हैं। 2018 में पुसू कोषाध्यक्ष नीतीश पटेल अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से बने, संगठन में उन्हें सम्मान मिला लेकिन आगामी चुनाव में उनकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं है।
2018 में योशीता पटवर्धन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से उपाध्यक्ष बनी थी। रिकॉर्ड वोट से चुनाव जीती थीं। वर्तमान में भाजपा से जुड़ी हैं, लेकिन वो सक्रिय नहीं है। अभी पढ़ाई कर रही हैं। इस बीच योशिता का नाम अरवल विधानसभा से चर्चा में आया था लेकिन फिर ठंडा हो गया है।
छात्र राजनीती में ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने छात्र राजनीती में खूब नाम कमाया लेकिन बिहार की राजनीती में उन्हें जगह नहीं मिल रही है। संजीव सरदार लोजपा से (रामविलास) जुड़े थे। उन्हें 2020 विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिला तो अब उन्होंने जनसुराज का दामन थाम लिया है। इसी तरह पटना यूनिवर्सिटी वाम दलों में प्रमुख छात्र नेता रहे तारिक अनवर का हाल इसी तरह का है। छात्र राजनीति से निकलकर वह भाकपा माले के सदस्य बने। जन आंदोलन के दौरान कई बार जेल भी गए। अब टिकट देने के समय उन्हें ठोस आश्वासन नहीं मिल रहा है।
पीयू के छात्र राजनीती का इतिहास उज्जवल रहा है। बिहार में अब तक 23 मुख्यमंत्री हुए हैं जिनमें 16 मुख्यमंत्री पटना विश्वविद्यालय के रहे हैं और आजादी के बाद से 77 वर्ष में 64 वर्ष पटना विश्वविद्यालय के पूर्ववर्ती छात्र ही मुख्यमंत्री रहे हैं। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी पटना विश्वविद्यालय के ही छात्र रहे हैं।
छात्र राजनीती को मेन विंग की राजनीति में कितनी अहमियत मिलती है इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव 2025 में इस बार मुकाबला महागठबंधन के दल कांग्रेस, आरजेडी और वामदल के बैनर तले उम्मीदवार हैं। वहीं, एनडीए से एबीवीपी के साथ साथ लोजपा लेकिन, जेडीयू ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे जिसने सबको हैरान कर दिया। जदयू इस मामले में ठोस जानकारी तक नहीं दे सका। इससे पता चलता है की सीएम नीतीश और सत्ताधारी पार्टी छात्र राजनीती को कितना महत्व देते हैं।




