पटना। यह भी ताज्जुब की बात है कि जनता के बीच जाने का मौका न मिले, लोगों से दो-चार न हों, जब प्रचार का समय हो तो नेता जेल की सलाखों के पीछे हों, फिर भी जेल के बाहर रहकर प्रचार करने वाले को मात दे देता है। यह पूरे देश में कई जगहों पर देखने को मिलता है, लेकिन बिहार में तो आम बात है। इस बार ही बिहार में छह नेता जेल में रहते हुए चुनाव लड़ रहे हैं। एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि पिछली बार 68 प्रतिशत विजयी उम्मीदवारों पर आपराधिक मुकदमें हैं।
हां, इतना जरूर है कि अनंत सिंह ऊर्फ छोटे सरकार का चुनावी चकल्लस के बीच जेल चले जाना चर्चा का विषय बना दिया है। यदि बिहार में रहकर चुनाव लड़ने वाले नेताओं का इतिहास देखें तो सबसे चर्चित चेहरा पहली बार जार्ज फर्नांडिस थे, जो 1977 में आपातकाल के दौरान जेल में रहते हुए मुजफ्फरपुर से लोकसभा चुनाव लड़े और जीत हासिल की। इतना जरूर है कि वे किसी मर्डर के केस में नहीं गये थे, वे राजनीतिक बंदी थे।
असुरक्षित जीवन के कारण बाहुबलियों से समर्थकों को दिखती सुरक्षा
1980 के बाद तो बिहार में बाहुबली को लोग राजनीति में हाथों-हाथ लेते थे। इसका कारण था कि बाहुबलियों से लोगों को लगता था कि उनके असुरक्षित जीवन को सुरक्षा प्रदान करने में वह सक्षम होगा। उस दौर में नक्सलवाद और जमीदारों के बीच लड़ाई का दौर था, जिसमें सैकड़ों की संख्या में लोगों ने जान गंवाई। ऐसे में पूरा समाज बंटा हुआ था। इसको बढ़ावा कई दल के शीर्षस्थ देते रहे और अपनी राजनीति चमकाते रहे।
दशकों से चली आ रही परंपरा
जेल से राजनीति बिहार की परंपरा सी है जो दशकों से चली आ रही है। ललन सिंह से लेकर लालू प्रसाद यादव तक और अब दुलारचंद यादव हत्याकांड मामले में गिरफ्तार हुए अनंत सिंह, कई बड़े नाम इस फेहरिस्त में शामिल हैं, जिन्होंने सलाखों के पीछे रहकर भी जीत की कहानी लिखी। उसी में शामिल हैं सीवान के मोहम्मद शाहाबुद्दीन और कई अन्य नेताओं ने जेल की सलाखों के भीतर रहते हुए चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। 2015 में भाकपा (माले) के सतदेव राम ने सीवान की दरौली सीट से जेल में रहते ही शानदार जीत हासिल की थी।
लालू का जेल जाने से नहीं घटा कद
किसी घोटाले में जेल में जाना और वहीं से चुनावी बिगुल फुंकने के बारे में देखें तो नाम आता है, लालू प्रसाद यादव का। वे 2013 में चारा घोटाला मामले में जेल गये। उस समय ऐसा लग रहा था कि उनका राजनीतिक करियर ही खत्म हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आरजेडी का जनाधार बढ़ गया। वे जेल से ही समर्थकों को संदेश देते रहे। उन्हें उनके समर्थकों ने दोषी नहीं माना और लालू मोर्चा संभाले रहे।
ललन सिंह भी कम नहीं
जेल में रहकर चुनाव लड़ने वालों में ललन सिंह (जनता दल यू) का भी प्रमुख नाम है। उनके खिलाफ जब कानूनी कार्रवाइयां हुईं, तब भी उन्होंने राजनीति से कदम पीछे नहीं खींचे। वहीं हालात कभी अनंत सिंह जैसे नेताओं के लिए भी बने जिन्हें ‘मोकामा का बाहुबली’ कहा गया। अनंत सिंह कई बार जेल में रहे, लेकिन हर बार जनता ने उन्हें वोट देकर विजयी बनाया। इस बार वे दुलारचंद यादव हत्याकांड के आरोपी हैं और अनंत सिंह को अदालत ने 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। पटना सिविल कोर्ट में पेशी के दौरान जज ने सुनवाई के बाद उन्हें जेल भेजने का आदेश दिया है।
जिनके लिए जेल कोई मायने नहीं रखता
इसी तरह, शहाबुद्दीन की कहानी भी बिहार की जेल पॉलिटिक्स का अहम हिस्सा है। इनके लिए जेल में रहना कोई मायने नहीं रखता था। सिवान का यह नाम कभी राजनीति और अपराध की सीमाओं को धुंधला कर देता था। जेल में रहते हुए भी शहाबुद्दीन का प्रभाव इतना था कि इलाके की राजनीति उसी के इशारों पर चलती थी। वे जब जो चाहे करने में सक्षम थे। जेल उनके लिए सेफ हाउस था।
छह नेता जेल में रहकर लड़ रहे चुनाव
वहीं, इस चुनाव की बात करें तो बिहार में अनंत सिंह को लेकर छह नेता जेल में रहते हुए चुनाव लड़ रहे हैं। अनंत सिंह से पहले से सीतामढ़ी के परिहार से निर्दलीय उम्मीदवार महेंद्र सिंह यादव भी जेल से मैदान में हैं। उनकी गिरफ्तारी के बाद इलाके में विरोध प्रदर्शन हुए और उनके समर्थकों ने प्रशासन पर पक्षपातपूर्ण कार्रवाई का आरोप लगाया। महेंद्र यादव पहले जदयू से जुड़े रहे, लेकिन इस बार निर्दलीय लड़ रहे हैं।
नामांकन के तुरंत बाद पुलिस ने किया गिरफ्तार
वहीं, वामपंथी नेता सत्यदेव राम को नामांकन भरने के तुरंत बाद पुलिस ने गिरफ्तार किया था। वे अभी दरौली से वर्तमान विधायक भी हैं और वहीं से चुनाव लड़ रहे हैं। उन पर एक पुराने प्रदर्शन से जुड़े मामले में गिरफ्तारी वारंट था। वहीं सत्येन्द्र शाह सासाराम से आरजेडी से चुनाव लड़ रहे हैं। उन्हें झारखंड पुलिस ने 2004 के गढ़वा बैंक लूट मामले में गिरफ्तार किया है। पार्टी का दावा है कि मामला पुराना है और राजनीतिक रूप से प्रेरित है।
लालू के खास रीतलाल भी हैं जेल में, जितेंद्र की भी यही कहानी
दानापुर सीट से आरजेडी के बाहुबली विधायक रीतलाल यादव भीजेल से चुनाव लड़ रहे हैं। जबरन वसूली, हत्या की साजिश और रंगदारी जैसे 30 से ज्यादा आपराधिक मामलों में नामजद रीतलाल को हाल ही में बेउर जेल से भागलपुर सेंट्रल जेल शिफ्ट किया गया है। इसके बावजूद उनका प्रचार आरजेडी के शीर्ष नेताओं, लालू यादव, तेजस्वी यादव और मीसा भारती के नेतृत्व में जारी है। सीपीआई एमएल लिबरेशन के उम्मीदवार जितेंद्र पासवान भी जेल में हैं। उनको नामांकन के कुछ दिन बाद ही पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। उन पर एक पुराने आपराधिक मामले में ग़ैर-जमानती वारंट जारी था। वाम दलों ने इस गिरफ्तारी को राजनीतिक साजिश बताया है।
छोटे सरकार पर 28 आपराधिक मामले दर्ज
मोकामा सीट से जदयू के कद्दावर नेता बाहुबली अनंत सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं। हत्या, अपहरण, अवैध हथियार, रंगदारी जैसे 28 से अधिक मामलों में आरोपित अनंत सिंह इस समय दुलारचंद हत्याकांड मामले में 14 दिनों की नयायिक हिरासत में हैं, लेकिन उनके लिए पूरा चुनावी प्रचार तंत्र मैदान में उतरा है। केन्द्रीय मंत्री ललन सिंह और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने भी अनंत सिंह के लिए रोड शो किया। वहीं, अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी, जो खुद मोकामा से विधायक हैं, इस बार उनके लिए प्रचार की अगुवाई कर रही हैं। 2020 में भी वे इसी स्थिति में विजयी हुए थे।
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क्या कहती है एडीआर की रिपोर्ट
एडीआर की रिपोर्ट इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करती है कि पिछले चुनाव में बिहार के 68 प्रतिशत विजेता नेताओं पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। यही नहीं 2025 के पहले चरण में नामांकन दाखिल करने वाले 1,303 प्रत्याशियों में से 32 प्रतिशत पर आपराधिक केस दर्ज हैं और लगभग 27 प्रतिशत पर गंभीर आरोप जैसे हत्या, हत्या का प्रयास और महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज हैं। आंकड़े बताते हैं कि “साफ-सुथरे” उम्मीदवारों की जीत दर लगातार गिरती जा रही है, जबकि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों का जीत प्रतिशत बढ़ता जा रहा है।




