नई दिल्ली। कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खड़गे को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संबंध में लिखे गए उनके पत्र को लेकर विधिक नोटिस जारी किया गया है। यह नोटिस सर्वोच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता रमण सिंह कश्यप की ओर से भेजा गया है।
जारी नोटिस में कहा गया है कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा की गई लिखित टिप्पणी या संप्रेषण का प्रभाव सामान्य राजनीतिक बयान से कहीं अधिक व्यापक होता है। ऐसे पदों पर आसीन व्यक्तियों से संवैधानिक मर्यादा, संस्थागत संतुलन, सार्वजनिक उत्तरदायित्व और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है।
भ्रम और संदेह की स्थिति
नोटिस में कहा गया है कि प्रियांक खड़गे द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैधता, पंजीकरण, पारदर्शिता और संगठनात्मक स्वरूप को लेकर उठाए गए सवालों से देशभर में करोड़ों लोगों के बीच भ्रम और संदेह की स्थिति पैदा हो सकती है। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगभग एक शताब्दी पुराना सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिससे भारत और विदेशों में बड़ी संख्या में लोग वैचारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से जुड़े हुए हैं।
समान पंजीकरण व्यवस्था अनिवार्य नहीं
अधिवक्ता रमण सिंह कश्यप ने नोटिस में कहा है कि किसी संस्था का पंजीकृत न होना स्वतः उसकी अवैधता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। भारत में विभिन्न समुदायों और धर्मों से जुड़े कई सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संगठन अलग-अलग संरचनाओं में कार्य करते हैं और सभी के लिए एक समान पंजीकरण व्यवस्था अनिवार्य नहीं है।
नोटिस में कहा गया है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना और आलोचना करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के वक्तव्यों और सार्वजनिक संप्रेषणों में अतिरिक्त जिम्मेदारी और संतुलन अपेक्षित होता है। ऐसे बयान या पत्र, जो किसी बड़े सामाजिक या सांस्कृतिक संगठन को लेकर व्यापक स्तर पर शंका पैदा करें, सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक बंधुत्व की भावना को प्रभावित कर सकते हैं।
उत्तरदायित्व स्वीकार करने की मांग
विधिक नोटिस के माध्यम से प्रियांक खड़गे से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कथित रूप से आहत नागरिकों के प्रति सार्वजनिक स्पष्टीकरण जारी करने, पत्र में निहित संकेतों और आशंकाओं को वापस लेने, पत्र जारी करने के कानूनी और तथ्यात्मक आधार को सार्वजनिक करने तथा भविष्य में इस प्रकार के सार्वजनिक संप्रेषणों से परहेज करने की मांग की गई है। साथ ही प्रतिष्ठा और भावनात्मक क्षति के संबंध में उत्तरदायित्व स्वीकार करने की भी मांग की गई है।
नोटिस में जवाब देने के लिए सात दिन का समय दिया गया है। निर्धारित अवधि के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में उपलब्ध दीवानी, आपराधिक और संवैधानिक उपायों पर विचार करने की बात कही गई है।



