भागलपुर: भागलपुर जिले के सबौर प्रखंड स्थित मसाढूं गांव से दिलों और दिमाग को झकझोर देने वाली सामाजिक सच्चाई सामने आई है। यह गांव आजकल कुंवारों की बस्ती के नाम से जाना जाने लगा है। वजह है गंगा नदी का कटाव और पिछली साल आई विनाशकारी बाढ़। जिसने इस गांव की तस्वीर ही बदल दी है। बाढ़ से न सिर्फ घर-बार उजड़ गए, बल्कि बेटे-बेटियों के रिश्ते भी टूटने लगे हैं, जो शादियाँ तय थीं, वे रुक गईं और नए रिश्ते आना भी बंद हो गए। कारण साफ है। गांव गंगा नदी के कटाव वाले मुहाने पर बसा है। इसलिए कोई भी पिता अपनी बेटी की शादी ऐसे असुरक्षित और उजड़े इलाके में नहीं करना चाहता।
अब इस गांव में बेटी-बेटे की शादी के लिए कोई तैयार नहीं होता। गांव की बेटियों की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। दहेज में देने लायक न तो जमीन बची है, न कोई जमापूंजी इस कारण शादी के प्रस्ताव भी ठुकरा दिए जाते हैं। हालात ऐसे हैं कि कई युवा लडक़े-लड़कियां शादी की उम्र पार कर चुके हैं। उनके लिए कोई रिश्ता नहीं आ रहा है।
मनोरमा देवी बताती है कि ईंट भट्ठा में पूरा परिवार मजदूरी करके बड़ी मेहनत से दो कैमरा का मकान बनाया था। वह नदी के बहार से कट कर गंगा में समा गया। बेटा अब शादी करने लायक है लेकिन रिश्ते नहीं आ रहे है, क्योंकि परिवार को रहने के लिए घर नहीं है। ऐसे में बहू को कहां रखेंगे। पहले शादी का रिश्ता आता भी था अब तो वह भी आना बंद हो गया है। हम लोग खुद खाने के लिए तरस रहे हैं। बहू के आने पर उसे क्या खिलाएंगे। मनोरमा देवी बताया कि एक बेटा पढ़ाई करता था। उसकी परीक्षा थी, उसी दौरान गांव में कटाव शुरू हुआ तो वह परीक्षा देने के बजाए घर का सारा सामान गंगा बहने से बचाने में लगा था।
इसी गांव के रहने वाले दिलीप मंडल की तीन बेटियां हैं। उनमें से एक की शादी गांव में कटाव होने से पहले कर दिए थे। अब दो बेटी शादी करने योग्य है। दिलीप ने बताया कि कड़ी मेहनत करके दो घर बनाया था। दोनों घर एक साथ कट गया अब बेटी की शादी के लिए जमा पूंजी भी नहीं है। घर बनाने के लिए पैसा भी नहीं है जगह जमीन भी नहीं है बेटी की शादी के लिए पहले तो रिश्ते आते थे अब आना बंद हो गए हैं। क्योंकि उनके खुद के रहने और बैठने की जगह नहीं है तो मेहबान को कहां बैठाएंगे। उन्होंने कहा कि बेटी के लिए जो भी रिश्ता के लिए आता हैं हम तैयार रहते हैं लेकिन वर पक्ष घर द्वार देखकर चला जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही है। समाज के लोगों ने मुझे यह जगह दिया है रहने के लिए और कहा है कि जब तक की सरकारी मदद नहीं मिलती, तब तक तुम यहां झोपड़ी बनाकर रह सकते हो। इसी झोपड़ी में मेरा गुजर बसर होता है।
उन्होंने कहा कि पहले कभी दो जगहों पर दो मंजिला मकान था। अब झोपड़ी में रहने को मजबूर है वह भी अपना नहीं पराया है। बेटा गुजरात में काम करता है। वह रुपये भेजता है उसी से घर का खर्चा चलता है। हम भी यहां पर मजदूरी करते हैं। कभी मेरे यहां मजदूर काम करते थे आज हम दूसरे के यहां मजदूरी करते हैं।
सरकार ने पुनर्वास का वादा किया था, पूरा नहीं किया
कंचन देवी ने बताया कि उनके दो जवान बेटा-बेटी है, एक साल पहले घर गंगा के तेज बहाव से कट गया था। सरकार ने घर बनाने और पुनर्वास का वादा किया था लेकिन अब तक पूरा नहीं किया है। पति मजदूरी करके राशन जुटाते हैं। बेटी की शादी की चिंता सता रही है, जब घर था तो लड़के वाले शादी का प्रस्ताव लेकर आते थे लेकिन अब नहीं आते हैं। ऐसे में बेटी की शादी नहीं कर पा रहे हैं। दूसरे के घर में अभी रह रहे हैं। मकान मालिक बाहर कमाने के लिए गया है। वह जब यहां लौट कर आएगा तो फिर हम लोग कहां जाएंगे पता नहीं। यहां पेयजल और शौचालय की समस्या है।
गांव में कुंवारे लडक़े-लड़कियों की संख्या 45
आर्यन कुमार बताते हैं कि गांव में लड़के और लड़कियों की संख्या 45 से अधिक है। लड़कियों की शादी इसलिए नहीं हो पा रही है कि जो जमा पूंजी था वह सारी गंगा में समा गई। अब जो पैसा है उससे शादी करें या घर बनाएं अथवा परिवार का भरण पोषण करे। दहेज में देने के लिए कुछ बचा नहीं, इसलिए बेटियों की शादी नहीं हो पा रही। जबकि बेटों की शादी इसलिए नहीं हो पा रहा है कि खुद लडक़ा का परिवार दूसरे के यहां से शरणार्थी बना हुआ है। वह शादी करके लडक़ी को कहां रखेगा।
गांव में परिवार के पास 5 से 10 बीघा जमीन थी
पहले गांव वाले राजा महाराजा के तरह थे, एक-एक परिवार के पास 5 से 10 बीघा जमीन हुआ करती थी। लेकिन अब कुछ नहीं बचा है सब गंगा में समा गया चारों तरफ पानी ही पानी नजर आ रहा है।
समस्या सामाजिक आपातकाल जैसी बन गई है
इस गंभीर सामाजिक मुद्दे पर ममलखा पंचायत के मुखिया अभिषेक मंडल ने बातचीत के दौरान बताया कि यह सिर्फ आर्थिक या भौगोलिक समस्या नहीं है। यह एक सामाजिक आपातकाल जैसी स्थिति बन गई है। गांव के लोगों को पुनर्वास की सख्त जरूरत है। सरकार से मांग की कि ऐसे गांवों के लिए विशेष पुनर्वास और सहायता योजना चलाई जाए ताकि इन परिवारों को फिर से सामाजिक सम्मान और स्थायित्व मिल सके गंगा किनारे बसे मसाढूं जैसे सैकड़ों गांवों में यही हालात हैं, जहां प्रकृति की मार ने लोगों का जीवन पूरी तरह बदल दिया है लेकिन जब यह मार सामाजिक रिश्तों और इंसानी गरिमा को भी लीलने लगे, तो यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं रह जाती, बल्कि एक सामाजिक त्रासदी बन जाती है।
सरकार के वादे भी फेल
कटाव के समय जब यहां के लोगों ने प्रयास किया तो सरकारी मुआवजे की बात कही गई लेकिन, इस पर भी पानी फिर गया है। इन लोगों को 1 लाख 20 हजार रुपए मुआजवजा देने की बात कही गई थी लेकिन, अब तक राशि आवंटित नहीं की गई है। कटाव पिडि़तों को जमीन देने की भी बात कही गई थी। कुछ लोगों को जमीन के कागजात भी मिले हैं लेकिन, अभी तक जमीन नहीं दी गई ताकि वह अपना घर बसा सकें। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि जिसकी जमा पूंजी और घर पूरी तरह से बर्बाद हो गया हो अगर सरकार उनकी भी मदद नहीं करती है उसका सहारा कौन होगा।



