पटना: बिहार विधानसभा चुनाव के लिए NDA में सीट बंटवारे का ऐलान हो गया है। बीजेपी और जेडीयू के बीच बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने का फॉर्मूला तय हुआ है, वहीं चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को 29 सीटें मिली हैं। बीजेपी और जेडीयू दोनों ही 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी, जबकि बची हुई सीटें छोटे सहयोगी दलों को दी गई हैं। इस बंटवारे में सबसे बड़ा फायदा चिराग पासवान की LJP(R) को हुआ है, जिसे गठबंधन में 29 सीटें मिली हैं। चिराग पासवान की पार्टी लगातार 30 से 35 सीटें मांग रही थी, और उन्हें मिली 29 सीटें उनकी मांग के करीब हैं।
चिराग पासवान का बढ़ता सियासी कद
बिहार की राजनीति में चिराग पासवान का बढ़ता कद अब किसी से छिपा नहीं है। उन्हें अब ‘किंगमेकर’ के तौर पर देखा जा रहा है। सवाल यह है कि बीजेपी और जेडीयू दोनों ने अपनी सीटों का ‘नुकसान’ उठाकर भी चिराग पासवान को इतना महत्व क्यों दिया है? चिराग पासवान अपने पिता और बिहार के दिग्गज दलित नेता राम विलास पासवान की राजनीतिक विरासत को संभाल रहे हैं। राम विलास पासवान का बिहार में गहरा दलित वोट बैंक था, खासकर दुसाध समुदाय में, जो राज्य में एक बड़ा जनसमूह है। एनडीए के लिए इस समुदाय का साथ जीत में निर्णायक साबित हो सकता है।
2024 की जीत और चिराग की अहमियत
चिराग की अहमियत 2024 के लोकसभा चुनाव में उनके शानदार प्रदर्शन से बढ़ी है। उनकी पार्टी ने लड़ी गई सभी पांचों सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस नतीजे ने बीजेपी और जेडीयू दोनों को यह स्पष्ट कर दिया कि चिराग पासवान अब केवल सहयोगी दल के नेता नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में एक बड़ी ताकत बन चुके हैं।
पसंदीदा सीटों पर फंसा पेंच
चिराग पासवान को मन के मुताबिक सीटों की संख्या तो मिली, लेकिन क्या उन्हें पसंदीदा सीटें भी मिल पाएंगी, यह अभी पूरी तरह से तय नहीं हुआ है। एनडीए में यह मामला उन सीटों पर फंस सकता है, जिन पर बीजेपी, जेडीयू और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) का कब्जा है। सूत्रों के अनुसार, चिराग पासवान ने जिन 29 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई है, उनमें कई सीटें ऐसी हैं, जिन पर जेडीयू और बीजेपी का कब्जा है। माना जा रहा है कि एलजेपी की दावे वाली चार सीटों पर बीजेपी का, तीन सीटों पर जेडीयू का और एक सीट पर जीतनराम मांझी की पार्टी (हम) का कब्जा है।
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जेडीयू को सीटें छोड़ना आसान नहीं
जेडीयू ने जिस तरह से पिछले चुनाव में सीटें जीती थीं, उनमें से अपनी जीती हुई सीटें छोड़ना उसके लिए आसान नहीं होगा। बीजेपी और जेडीयू के शीर्ष नेतृत्व के दखल के बाद ही चिराग पासवान 29 सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार हुए हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सीट-साझाकरण की अंतिम सूची में एलजेपी को कौन-सी सीटें मिलती हैं और क्या बीजेपी-जेडीयू अपनी जीती हुई सीटें चिराग के लिए छोड़ने को तैयार होती हैं।
2020 की रणनीति से सबक
2020 के चुनाव में चिराग पासवान एनडीए का हिस्सा नहीं थे और उन्होंने 135 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें वह केवल 1 सीट जीत पाए थे। हालांकि, एनडीए से बाहर रहकर लड़ने पर उन्होंने नीतीश कुमार की पार्टी को गहरा झटका दिया था, जिससे एनडीए में पहली बार बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। 2025 के विधानसभा चुनाव में रणनीति बिल्कुल अलग है। चिराग की पार्टी एनडीए के साथ ही चुनाव लड़ रही है, और 29 सीटें मिलने से वह संतुष्ट दिख रहे हैं। गठबंधन के भीतर चिराग की यह नई भूमिका उन्हें बिहार की सत्ता की चाबी में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के तौर पर स्थापित करती है।



