नई दिल्ली: पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर से महज 35 किलोमीटर दूर बसा मथानिया कस्बा कभी अपनी स्थानीय लाल मिर्च के तीखे जायके के लिए दुनिया भर में जाना जाता था। यह मिर्च न केवल बेहद तीखी होती थी, बल्कि इसमें बीज कम, वजन अच्छा और लंबाई 6-7 इंच तक होती थी, जो लाल रंग के कारण पाउडर रूप में भी बेजोड़ स्वाद देती। जोधपुर के प्रसिद्ध मसालों को यह चमक बख्शती थी। देशी किस्म होने के कारण यह मथानिया, तिवरी, ओसिया और सोयला जैसे इलाकों में ही उगाई जाती और आचार-पाउडर के रूप में देश-विदेश तक पहुंचती। लेकिन समय के साथ किसानों ने इसे लगभग छोड़ दिया, जिससे इसका उत्पादन घटता चला गया। अब जीआई टैग की कोशिशों से यह फिर से चर्चा में आ रही है।
गिरावट के काले अध्याय
सरकारी आंकड़ों से साफ है कि 1998-99 में जोधपुर में मथानिया मिर्च का बुआई क्षेत्र 10,500 हेक्टेयर था, जहां प्रति हेक्टेयर 1.8 टन उपज होती। लेकिन 2008-09 तक यह घटकर 3,900 हेक्टेयर और 0.6 टन रह गया। 2019-20 में तो महज 692 हेक्टेयर पर 0.5 टन उत्पादन बचा। कृषि विशेषज्ञ डॉ. रामपाल जागिड़ के मुताबिक, मुख्य वजह अत्यधिक सिंचाई से मिट्टी की नमी बढ़ना, जिससे रोग-कीटों का कहर टूट पड़ा। भूजल स्तर 500 फुट से गिरकर 850-950 फुट हो गया और पानी में नमक की मात्रा बढ़ गई। अमेरिका के मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के 1988 के शोध में भी चेतावनी दी गई थी कि किसान 50,000 गैलन पानी रोज इस्तेमाल कर रहे हैं, जो 9 महीने के मौसम में 40-60 सिंचाइयों का कारण बनता है एक खतरनाक दोहन।
रोगों का प्रकोप और किसानों की मजबूरी
अधिक नमी से एंथ्राक्नोज़ जैसी फफूंदी रोग ने पौधों को कमजोर कर दिया, जिसे पत्ती मरोड़ भी कहते हैं। इससे पत्तियां सिकुड़ जातीं, फलन रुक जाता और उपज चौपट हो जाती। स्थानीय किसान अशोक कुमार, जो 18 बीघा में मिर्च उगाते हैं, बताते हैं कि उनके पिता अमृतलाल के जमाने में एक क्यारी से 25-30 किलो मिर्च मिलती थी, लेकिन अब 10-12 किलो ही। पहले 1-2 स्प्रे काफी थे, अब 5-6 महंगे रसायनों के बाद भी नतीजा कमजोर। इसीलिए कई सालों तक उन्होंने कपास-अरंडी जैसी फसलों की ओर रुख किया।
उम्मीद की नई किरण
अब सकारात्मक बदलाव दिख रहे हैं। 2022 में बुआई क्षेत्र बढ़कर 822 हेक्टेयर हो गया, और उपज 0.6 टन प्रति हेक्टेयर पहुंची। जून 2025 के कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर के प्रस्ताव के अनुसार, अब 1,000 हेक्टेयर में बुआई हो रही है। आरसीएच-1 जैसी नई किस्म ने किसानों को लौटाया है यह स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल है, हालांकि इसमें मथानिया जैसा तीखापन कम, हल्की मिठास और ज्यादा बीज हैं। पिछले 6-7 सालों में जलवायु परिवर्तन से बारिश बढ़ी, भूजल रिचार्ज हुआ और लवणता घटी। किसानों ने वर्षा जल संचयन भी अपनाया। मथानिया-तिवरी में एफपीओ बने, जिन्होंने वैज्ञानिक खेती और बाजार व्यवस्था सुधारी। अब मथानिया मिर्च को सामान्य से बेहतर दाम मिलते हैं।
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जीआई टैग: भविष्य की कुंजी
कृषि विशेषज्ञ डॉ. विकास पावड़िया बताते हैं कि जीआई टैग 1999 के अधिनियम के तहत मिलता है, जो उत्पाद की अनोखी विशेषता को संरक्षित करता है। इससे निर्यात मजबूत होता, नकल रुकती और अंतरराष्ट्रीय मानक बने रहते। ग्राहकों को असली स्वाद मिलता और किसानों को आर्थिक लाभ। अगर यह टैग मिला, तो मथानिया मिर्च का पुराना रुतबा लौट सकता है, जो जोधपुर की सांस्कृतिक धरोहर को नई ऊंचाई देगा।



