गया: चुनावों में प्रत्याशियों की जीत हार को लेकर दलबदलुओं और भीतरघातियों की प्रमुख भूमिका रही है। प्राय: सभी दलों को चुनावों के ऐन पहले पार्टी बदलने वाले महत्वाकांक्षी नेताओं या टिकट नहीं मिलने से नाराज लोगों की उल्टी चाल से खतरा बना रहता है।
2020 के चुनाव में 205 बागी लड़े थे चुनाव
वर्ष 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में भी कम से कम 205 ऐसे प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे, जिन्होंने अपनी मूल पार्टी छोड़कर चुनावों के ऐन पहले दल बदल लिया था। हालांकि इनमें सिर्फ दस प्रतिशत प्रत्याशी ही चुनावी जीत तक पहुंच सके थे।
टिकट वितरण में धांधली को लेकर 22 नेताओं ने दिया था इस्तीफा
पाठकों को याद होगा कि पिछले 25 मई को ही राजद के प्रमुख नेता और पूर्व मंत्री तेजप्रताप यादव की गतिविधियों को लेकर उन्हें दल से बाहर किया गया। अब तेजप्रताप यादव के बगावती अंदाज से पार्टी मुश्किल में है। इससे पूर्व 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान बिहार में पार्टी की ओर से प्रत्याशियों के चयन या टिकट वितरण में धांधली के आरोपों को लेकर लोजपा (रामबिलास) के 22 नेताओं ने एक साथ इस्तीफा दे दिया था। पार्टी के प्रति लम्बे समय से समर्पित नेताओं का गुस्सा इस बात को लेकर था कि राजनीति की डगर पर शुरुआती कदम रखने वाली जदयू के एक बड़े नेता और मंत्री अशोक चौधरी की बेटी शांभवी को दल में शामिल होने के तुरंत बाद लोजपा (रा) ने सम्सतीपुर लोकसभा सीट से चुनावी टिकट दे दिया था। चुनाव में वह जीत कर सांसद भी बन गई।
जब पटना में हुआ था नंग धड़ंग प्रदर्शन
इससे पूर्व वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव से ऐन पहले जब जदयू ने गया जिले के शेरघाटी में सक्रिय राजद के एक कार्यकर्ता और शेरघाटी के ब्लाक प्रमुख विनोद प्रसाद यादव को पार्टी में शामिल कराकर चंद घंटे में ही शेरघाटी सीट से चुनावी उम्मीदवार घोषित कर दिया तो शीर्ष नेतृतव के निर्णय का विरोध करने वाले पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ताओं ने बगावती तेवर अख्तियार करते हुए पटना में नंग धडंग़ प्रदर्शन तक किया था। तब भी नेतृत्व का फैसला नहीं बदला था और दूसरे दल से आए विनोद यादव जदयू के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते थे। नेताओं-कार्यकर्ताओं के ऐसे बगावती सुर से निबटने के लिए मान-मनौव्वल और समझौते से लेकर दल से निष्कासन तक के तरीके तमाम पार्टियां अपनाती रही हैं, मगर यहां हम बागियों से निबटने के निमित्त जनसुराज की ओर से तैयार किए गए ऐसे फार्मूले की चर्चा कर रहे हैं, जिसका तरीका नायाब है।
बिहार में 15 प्रमुख दल लड़ते हैं चुनाव
सुधी पाठकों को पता है कि बिहार के चुनावों में प्रमुख 15 राजनीतिक दल हिस्सा लेते हैं, इनमें एक नया नाम पिछले वर्ष 2 अक्तूबर 2024 को जुड़ा था, जब जनसुराज ने एक राजनीतिक पार्टी की शक्ल अख्तियार की थी। सवा करोड़ सदस्यों के साथ पार्टी के गठन के दावे के बाद इस दल के शीर्ष नेतृत्व खासकर पार्टी के सूत्रधार और सर्वेसर्वा प्रशांत किशोर ने जातीय-धार्मिय समीकरण की परवाह किए बगैर युवाओं, नवसिखुओं और समाज के लिए कुछ करने की चाह रखने वाले जोशीले राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पार्टी प्रत्याशी बनने का खुला न्योता भी दिया। जाहिर है जातीय गुणा-भाग में अनफिट होने वाले सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं के भी भाग जगे और बड़ी संख्या में ऐसे लोगों ने जनसुराज से चुनाव लड़ने का पर्चा भरा।
गया में जनसुराज से टिकट मिलने की चाह में हैं 55 प्रत्याशी
नतीजा हुआ कि बिहार की कई सीटों पर जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष की पार्टियों से संभावित उम्मीदवारों की संख्या सिंगल डिजिट में ही सीमित रही, वहीं नई-नवेली पार्टी जनसुराज में संभावित प्रत्याशियों की बड़ी फौज खड़ी हो गई। पार्टी के एक प्रभावशाली नेता जावेद अहमद खां बताते हैं कि सिर्फ गया जिले की दस विधानसभा सीटों पर चुनाव लडऩे के लिए 55 अभ्यर्थियों ने नामांकन कराया है। गया की शेरघाटी जैसी सीट पर जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष से गिनती के संभावित उम्मीदवार हैं, वहीं जनसुराज जैसी नई-नवेली पार्टी से 12 संभावित प्रत्याशी हैं।
बगावत से निबटने का क्या है तरीका
टिकट से वंचित होने वाले कार्यकर्ताओं की संभावित बगावत या उनके विद्रोही तेवर से निबटने के सवाल पर जावेद अहम खां कहते हैं कि जनसुराज में ऐसी किसी बगावत का खतरा नहीं है। एक तो इस पार्टी ने उम्मीदवार चयन का इतना साफ सुथरा और पारदर्शी तरीका बनाया है कि किसी के गुस्सा होने या विद्रोह करने का सवाल ही नहीं है। पार्टी में पैसे लेकर टिकट बांटने या फिर भाई-भतीजावाद, परिवारवाद और जातिवाद का भी चलन नहीं है।
देखने वाली बात यह है कि बिहार में बदलाव के लिए कार्यक्रम, साधन और अक्ल-बुद्धि देकर पार्टी गांव-गांव में नेतृत्वकर्ता पैदा कर रही है। तमाम लोग जानते हैं कि विधानसभा चुनावों के बाद लोकसभा चुनाव, ग्राम पंचायत और नगर निकाय के चुनाव विधान परिषद के चुनाव आदि चलते ही रहते हैं। ऐसे में विधानसभा चुनाव लडऩे से वंचित रहे समर्पित कार्यकर्ताओं को दूसरी जगह मौका मिलेगा। व्यवस्था बदलने पर कार्यकर्ताओं के लिए दूसरे कई मौके होंगे सो अलग। पार्टी टिकट भले न दे, नेता तो बना ही दे रही है। जिसने कभी कोई सभा-मीटिंग नहीं की, कभी माईक-मंच से बोला नहीं। ऐसा कार्यकर्ता भी लगातार राजनीतिक अभियानों के कारण दूसरे दल के मुकाबिल नेताओं पर भारी पडऩे लगा है।
हर विधानसभा क्षेत्र के 40 गांवों में होगी सामुहिक सभा
पीले झंडे वाली पार्टी के नेता कहते हैं कि इससे भी अहम और तमाम दूसरे दलों के तरीके से बिल्कुल भिन्न पार्टी ने यह निर्णय लिया है कि एक चुनाव क्षेत्र के तमाम संभावित प्रत्याशी एक साथ पचास-साठ गाडिय़ों के काफिले और पार्टी के झंडे-बैनर के साथ विधानसभा क्षेत्रों के एक तिहाई या 40 गांव-कस्बों में जाएंगे और पार्टी की नीतियों, विचारों और कार्यक्रमों पर जनता से सीधे संवाद करेंगे। ऐसी सभाओं और संवाद कार्यक्रमों में संभावित प्रत्याशी अपने नाम और महत्वाकांक्षाओं को पीछे रखेंगे। इस तरीके पर अमल भी शुरु हो गया है। इस तरीके ने सूबे के तमाम राजनीतिक धुरंधरों को चौंका दिया है।
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क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक
बिहार की राजनीतिक गतिविधियों पर बारीक नजर रखने वाले मगध विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर डा.मदनमोहन शर्मा कहते हैं कि जनसुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर राजनीति-समाज और चुनाव के विषय में अद्वितीय प्रतिभा के मालिक हैं। प्रत्याशियों की सामूहिक सभा के उनके सुझाए यह तरीके न केवल दूसरे दलों से बिल्कुल अलग हैं, बल्कि प्रभावकारी और प्रशंसनीय भी हैं। एक अन्य राजनीतिक टीकाकार हाफिज रूकनुद़्दीन अहमद कहते हैं कि जनसुराज ने बागियों से निबटने का यह कामयाब तरीका खोजा है।




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