पटना: बिहार की राजधानी पटना में मंगलवार को टीईटी उर्दू-बांग्ला के अभ्यर्थियों ने अपने रिजल्ट की मांग को लेकर जनता दल यूनाइटेड (JDU) कार्यालय के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शनकारी पिछले दस साल से अपने परिणाम जारी करने की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और अभ्यर्थियों के बीच झड़प भी हुई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए मौके पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया। अभ्यर्थियों का आरोप है कि उन्हें पहले पास घोषित कर दिया गया था, लेकिन बाद में उनका रिजल्ट रोक दिया गया। वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जल्द से जल्द उनकी मांगें पूरी करने की गुहार लगा रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें
प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों का कहना था कि साल 2013 में हुई उर्दू-बांग्ला टीईटी परीक्षा का रिजल्ट आज तक जारी नहीं किया गया है। उनमें से एक अभ्यर्थी ने मीडिया को बताया कि “2013 में हमारा रिजल्ट आया था और मेरिट लिस्ट में नाम भी था। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी हमारे पक्ष में फैसला सुनाया, और हमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी आश्वासन मिला था। लेकिन 12 साल बीत जाने के बाद भी हम इधर-उधर भटक रहे हैं।”
पुलिस और JDU कार्यालय में तालाबंदी
प्रदर्शन की गंभीरता को देखते हुए, JDU कार्यालय में तालाबंदी कर दी गई। वहीं, बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था ताकि स्थिति को नियंत्रण में रखा जा सके। प्रदर्शनकारी, जिनकी संख्या लगभग 12,000 बताई जा रही है, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने की जिद पर अड़े थे। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे JDU कार्यालय के बाहर आत्मदाह करेंगे।
न्याय की मांग और आरोप
नालंदा से आईं एक महिला अभ्यर्थी ने आरोप लगाया कि अल्पसंख्यक होने के कारण उनके साथ नाइंसाफी की जा रही है। उन्होंने कहा, “अगर हम जनरल होते तो शायद न्याय मिल गया होता।” कई अभ्यर्थियों ने यह भी बताया कि उन्हें पहले पास घोषित किया गया था, पंचायत, जिला और प्रखंड स्तर पर आवेदन भी करवाए गए थे, और मेरिट लिस्ट में नाम आने के बाद भी उन्हें फेल कर दिया गया। ये सभी अभ्यर्थी मुख्यमंत्री से जल्द से जल्द रिजल्ट जारी कर नौकरी देने की मांग कर रहे हैं। यह मुद्दा पिछले एक दशक से लंबित है, और अभ्यर्थियों में सरकार के प्रति गहरा रोष दिखाई दे रहा है।
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मुख्य मुद्दे और घटनाक्रम:
परीक्षा और प्रारंभिक परिणाम (2013): 2013 में परीक्षा आयोजित हुई, और अभ्यर्थियों के अनुसार, उनका प्रारंभिक परिणाम जारी हुआ जिसमें वे मेरिट लिस्ट में शामिल थे। इसके बाद, पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर पर उनसे आवेदन भी लिए गए थे, जिससे उन्हें यह विश्वास हो गया था कि उनकी नियुक्ति जल्द ही होगी।
परिणाम को रोकना: अभ्यर्थियों का आरोप है कि किसी अज्ञात कारण से, उनके परिणाम को रोक दिया गया और उन्हें नौकरी नहीं दी गई। कुछ अभ्यर्थियों का यह भी कहना है कि उन्हें पहले पास घोषित किया गया था, लेकिन बाद में उन्हें असफल करार दिया गया, जो उनके लिए एक बड़ा झटका था।
कानूनी लड़ाई और सरकारी आश्वासन: निराश अभ्यर्थियों ने अपनी मांगों को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनके अनुसार, दोनों अदालतों ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था। इसके अलावा, उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी कई बार मुलाकात की और उन्हें आश्वासन भी मिला, लेकिन इसके बावजूद उनकी समस्या का समाधान नहीं हो पाया।
लगातार प्रदर्शन और विरोध: पिछले एक दशक से, ये अभ्यर्थी बार-बार अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। वे कई बार लाठीचार्ज का भी शिकार हो चुके हैं, लेकिन सरकार ने उनकी मांगों को अनसुना कर दिया है।
हालिया प्रदर्शन का कारण: इस बार का प्रदर्शन JDU कार्यालय के बाहर किया गया है, क्योंकि वे सीधे मुख्यमंत्री और सत्ताधारी पार्टी पर दबाव डालना चाहते हैं। उनकी मुख्य मांग यही है कि सरकार अदालती फैसलों और अपने आश्वासनों का सम्मान करते हुए जल्द से जल्द उनके परिणाम जारी करे और उन्हें नियुक्ति दे।
यह पूरा मामला बिहार में लंबित शिक्षक नियुक्तियों और सरकारी उदासीनता को दर्शाता है, जिसके कारण हजारों युवाओं का भविष्य अनिश्चितता में है।



