मुजफ्फरपुर: बिहार के सरपंच अब साइबर ठगों के नए निशाने पर हैं। जिला पंचायती राज अधिकारी (DPRO) बनकर ठग सरपंचों को एक ऑनलाइन मीटिंग का लिंक भेज रहे हैं, जिस पर क्लिक करते ही उनके बैंक खातों से लाखों रुपये गायब हो रहे हैं। मुजफ्फरपुर में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिसने प्रशासन और पुलिस की चिंता बढ़ा दी है।
DPRO बनकर ठगी का नया पैंतरा
यह ठगी का एक नया और संगठित तरीका है, जिसमें साइबर अपराधी खुद को जिला पंचायती राज अधिकारी बताते हैं। वे सरपंचों को फोन कर कहते हैं कि उन्हें प्रशिक्षण अवधि या किसी सरकारी योजना के तहत भुगतान किया जाना है। इस राशि को प्राप्त करने के लिए उन्हें एक ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ने के लिए एक लिंक भेजा जाता है। जैसे ही सरपंच उस लिंक पर क्लिक करते हैं, उनके खाते से पैसे निकल जाते हैं।
ताजा मामला कुढ़नी के सकरी सरैया पंचायत के सरपंच लक्ष्मी साह का है, जिनसे ठगों ने इसी तरीके से 7,350 रुपये की ठगी की। लक्ष्मी साह ने तुरंत साइबर थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए ठगी की गई राशि को होल्ड कर दिया और एक बैंक खाते को फ्रीज करा दिया है।
पहले भी हो चुकी है ठगी
यह पहली बार नहीं है जब इस तरह का मामला सामने आया है। इससे पहले, औराई की भदई पंचायत के सरपंच मिथलेश राम भी इसी तरह के फ्रॉड का शिकार हुए थे। उन्हें भी जिला पंचायती राज अधिकारी के नाम पर एक मीटिंग का लिंक भेजा गया था, जिस पर क्लिक करने के बाद उनके खाते से 77,189 रुपये उड़ा लिए गए थे। उन्होंने 25 अगस्त को इस घटना की शिकायत दर्ज कराई थी।
प्रशासन ने जारी की चेतावनी
इन घटनाओं के बाद, जिला पंचायती राज अधिकारी ने सभी सरपंचों को पत्र लिखकर इस तरह के फ्रॉड कॉल से सावधान रहने की चेतावनी दी है। इसके बावजूद, कुछ सरपंच इस जाल में फंस रहे हैं। साइबर डीएसपी हिमांशु कुमार ने बताया कि इस तरह की ठगी की शिकायतों पर पुलिस तेजी से कार्रवाई कर रही है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करें और किसी भी सरकारी अधिकारी द्वारा मांगी गई वित्तीय जानकारी को सत्यापित किए बिना साझा न करें।
डिजिटल डिवाइड और जागरूकता की कमी
भारत के ग्रामीण इलाकों में, खासकर सरपंचों और अन्य स्थानीय नेताओं में, डिजिटल साक्षरता अभी भी कम है। कई सरपंचों के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा तो है, लेकिन वे ऑनलाइन खतरों, जैसे फ़िशिंग, मैलवेयर और अन्य साइबर अपराधों के बारे में पूरी तरह से जागरूक नहीं हैं। इसी का फायदा उठाकर अपराधी उन्हें निशाना बनाते हैं।
सरकारी योजनाओं और भुगतान का लालच
साइबर ठग जानते हैं कि सरपंचों को अक्सर सरकारी योजनाओं के तहत विभिन्न प्रकार के भुगतान और प्रशिक्षण मिलते हैं। वे इसी बात का लाभ उठाते हैं। ठग खुद को सरकारी अधिकारी (जैसे जिला पंचायती राज अधिकारी) के रूप में पेश करते हैं और सरपंचों से कहते हैं कि उनका पैसा रुका हुआ है या उन्हें कोई नया भुगतान मिलने वाला है। यह बात सुनकर सरपंच जल्दी उन पर भरोसा कर लेते हैं और बिना सोचे-समझे लिंक पर क्लिक कर देते हैं।
फ़िशिंग और सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल
यह फ्रॉड “फ़िशिंग” और “सोशल इंजीनियरिंग” का एक क्लासिक उदाहरण है।
फ़िशिंग: इसमें ठग किसी भरोसेमंद स्रोत (जैसे सरकारी अधिकारी) का रूप धारण करके लोगों को ईमेल, मैसेज या लिंक भेजते हैं ताकि उनकी गोपनीय जानकारी, जैसे बैंक डिटेल या ओटीपी, चुराई जा सके।
सोशल इंजीनियरिंग: इसमें ठग मनोवैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। वे पीड़ितों को डराते हैं या उन्हें तुरंत कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करते हैं। जैसे, “यह पैसा तुरंत नहीं लिया तो चला जाएगा” या “मीटिंग में तुरंत जुड़ें।”
तकनीकी और कानूनी चुनौतियाँ
साइबर फ्रॉड से निपटना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि अपराधी अक्सर दूसरे राज्यों या देशों में बैठे होते हैं। वे फर्जी फोन नंबर और खातों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। पुलिस को भी ऐसे मामलों की जांच के लिए विशेष साइबर फोरेंसिक कौशल और उपकरणों की आवश्यकता होती है।
इन तरीकों का इस्तेमाल करके ठग पीड़ितों से उनकी जानकारी निकलवा लेते हैं और उनके खातों से पैसे उड़ा देते हैं। इस मामले में, वे मीटिंग का लिंक भेजकर यह विश्वास दिलाते हैं कि यह एक आधिकारिक प्रक्रिया है, जबकि असल में वह एक फ़िशिंग लिंक होता है।
इन सब कारणों से, यह साइबर फ्रॉड का एक संगठित और लगातार बढ़ता हुआ तरीका बन गया है, जिसका शिकार अब ग्रामीण क्षेत्रों के लोग भी हो रहे हैं



