लखनऊ। रविवार रात को खरना का पारण करने के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरु हो गया। आज सोमवार को व्रती महिलाएं शाम को डुबते सूर्य को अर्घ्य देंगी। इसके लिए आज सुबह से ही व्रती महिलाएं तैयारी में जुट गयीं। बाजारों में खरीदारी के लिए भीड़ लगी रही तो घरों में ठेकुआ बनता रहा। मंगलवार को सुबह उगते सूर्य का अर्घ्य देकर व्रत का समापन होगा। इस मौके पर हर काम में घर से लेकर घाट तक गीत से माहौल भक्तिमय बना रहता है।
प्रकृति की पूजा के इस महापर्व को शास्त्र की जटिलताओं से मुक्त कर दिया गया है। इस पर्व में सर्वजन को यह अधिकार होता है कि वह स्वयं अपना पुरोहित बनें। इसलिए इस पर्व का व्रती स्वयं साधक तथा स्वयं पुरोहित भी होता है। शायद छठ मां की ही ऐसी पूजा है, जिनका कहीं भी मंदिर नहीं मिलेगा। ये सिर्फ छठ तक ही सीमित रहता है। इस कारण व्रती के मन और आत्मा को ही छठ मां का प्रतीक भी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि व्रती के शरीर में छठ मां बैठती हैं। इसी कारण बहुत लोग घाटों पर जाकर व्रतियों को प्रणाम करते हैं।

सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत
सनातन भारतीय संस्कृति में सूर्य को ऊर्जा का अक्षय स्रोत माना गया है। अतः भारत में वैदिक काल से ही सूर्योपासना व्यापक रूप से प्रचलित रही है। बिहार में सूर्योपासना “छठ” व्रत के रूप में की जाती है। ‘छठ’ शब्द संस्कृत के ‘ षष्ठ ‘ शब्द का तद्भव रूप है। व्रत में संकल्प के साथ नियमावली होती है, जिसका पालन करना बहुत ही जरूरी होता है। साधारणत: उपवास में अन्न का त्याग होता है तथा परमात्मा का चिन्तन होता है। इस दृष्टि से व्रत एवं उपवास दोनों का समन्वित रूप छठ पर्व है।
सूर्य की रश्मियों की छह शक्ति के रूप में होती है पूजा
सूर्य की रश्मियों में छह अप्रतिम शक्तियां विद्यमान हैं – दहनी, पचनी, धूम्रा, कर्षिणी, वर्षिनी तथा रसा अर्थात जलने वाली, पाचन क्रिया करने वाली लोहित करने वाली, आकर्षण करने वाली, वर्षा करने वाली और रस प्रदान करने वाली। भगवान सूर्य की ये छ: शक्तियां ही “छठी मैया” कहलाती हैं।
शरीर व स्थल की शुद्धि का रखा जाता विशेष ख्याल
चार दिन तक चलने वाले छठ पर्व पर शुद्धता, स्वच्छता का विशेष ख्याल रखा जाता है। छठ षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। षष्ठी तिथि स्त्रीलिंग है। अतः यह “छठी मैया” के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह लोक-पर्व स्वच्छता को पवित्रता तक ले जाने में सहायक होती है। स्नान से शरीर-शुद्धि की और ध्यान से अंतःकरण की पवित्रता से व्रत का आरंभ होता है। “नहाय – खाय” यह संदेश देता है कि भोजन के पहले शरीर शुद्धि बहुत ही जरूरी है । दूसरे दिन खीर खाकर अपने उपवास को संबलता प्रदान करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। तीसरे दिन षष्ठी तिथि को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर सप्तमी के सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हैं। एक तरह से पुनर्जन्म के गूढ़ सिद्धांत को बड़े ही सरल ढंग से प्रकट करते हैं।
विष्णु धर्मोत्तर में कहा गया है –
इस संबंध में शास्त्रों के जानकार व ज्योतिषाचार्य मुनेन्द्र उपाध्याय विष्णु धर्मेत्तर के इस श्लोक “उदिते दैवतं भानौ पित्र्यं चास्तमिते रवौ।“ अर्थात् देव-कार्यों में सूर्योदय की तिथि और पितृ-कार्यों में सूर्य के अस्त की तिथि उपयोगी होती है। छठ-पर्व एकमात्र ऐसा पर्व है जहां देव-कार्य एवं पितृ-कार्य दोनों श्रद्धा से संपन्न होते हैं।“ का उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि यह प्रकृति के साथ ही लोगों को सामूहिकता को दर्शाता है।
छठ पर्व की पौराणिकता एवं विशिष्टता
ज्योतिषाचार्य और इलाहाबाद हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीनिवास राय का कहना है कि शिव पुराण के रूद्र संहिता के अनुसार भगवान शिव के तेज से छ: मुख वाले बालक का जन्म हुआ, जिसका पालन-पोषण छ: कृतिकाओं (तपस्विनी नारियों) ने किया था , जिससे यह बालक कार्तिकेय नाम से विख्यात हुआ। ये छ: कृतिकायें ही षष्ठी माता या छठी मैया कहलाती हैं।
ज्योतिषाचार्य ने कहा
ज्योतिषाचार्य मुनेन्द्र उपाध्याय का कहना है कि सूर्यपुत्र कर्ण घंटों तक कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देता था। आज भी यही पद्धति हम सभी छठ पर्व में अपनाते हैं। इस व्रत को सर्वप्रथम च्वयन मुनि की पत्नी सुकन्या ने अपने जरा-जीर्ण अंधे पति की आरोग्यता के लिए किया था। इस व्रत से उनके पति युवा हुए तथा उन्हें नेत्र प्राप्त हुआ था। भगवान राम का जन्म सूर्यवंश में हुआ था। ऋषि अगस्त्य ने लंकापति रावण को परास्त करने के लिए भगवान राम को “आदित्य हृदय स्तोत्र” का पाठ बताया था , जो सूर्य – उपासना का एक उच्चस्तरीय प्रयोग था।
भगवान राम और सीता ने रखा था व्रत
वहीं एक दूसरी कथा का उद्धरण देते हुए वे बताते हैं कि भगवान राम एवं भगवती सीता ने राम राज्य की स्थापना के दिन अर्थात् कार्तिक शुक्ल षष्ठी को ही उपवास कर सूर्य देव की आराधना की थी। भगवान श्री कृष्ण के पुत्र सांब के कुष्ठ रोग का उपचार सूर्य उपासना द्वारा हुआ था। छांदोग्य उपनिषद में सूर्य के माध्यम से पुत्र-प्राप्ति की बात कही गई है। माता कुंती से कर्ण का जन्म सूर्य भगवान के मानवीकरण को दर्शाता है।
यह भी पढ़ें: छठ के रंग में रंगी सियासत, राजनीतिक दल बिछा रहे वोट का जाल
धौम्य ऋषि ने पांडवों को दी थी सलाह
ज्योतिषाचार्य पुनीत श्रीवास्तव पांडवों का उद्धरण देते हैं। वे कहते हैं कि पांडवों के वनवास के दौरान अन्न की कमी से बचने के लिए धौम्य ऋषि ने युधिष्ठिर को अष्टोत्तर-शतनाम सूर्य स्तोत्र ( सूर्य के १०८नाम ) दिया था तथा सूर्य की उपासना करने का परामर्श दिया था। इस उपासना से भगवान भास्कर ने प्रकट होकर एक ताम्रपत्र दिया और कहा कि जब तक रानी द्रोपदी इस पात्र में भोजन नहीं करेगी , तब तक इस में स्थित भोज्य-पदार्थों की कमी नहीं होगी। इसके पश्चात् द्रौपदी षष्ठी-तिथि को उपवास करने लगी। फलस्वरूप पांडवों को उनका खोया हुआ राजपाट वापस मिल गया था।



