बिहार में भाजपा का संगठन अच्छा, मगर कोई चेहरा नहीं

बिहार में भाजपा की पूर्ववर्ती जनसंघ का खाता तीसरे विधानसभा चुनाव में खुला। तीन विधायकों के साथ जनसंघ का खाता खुला। इसके बाद वह प्रगति की ओर बढ़ती रही। आइए, जानते हैं बिहार में 1952 से आज तक की भाजपा की स्थिति। पूरा डाटा बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र नाथ राय

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पटना: भाजपा का गठन तो 1980 में हुआ, लेकिन जनसंघ के रूप में भाजपा ने पहले चुनाव से ही बिहार चुनाव में जोर आजमाइश शुरु कर दी थी। दो चुनावों में इसे सफलता नहीं मिली, लेकिन 1962 में हुए तीसरे विधानसभा चुनाव में तीन सीटों पर विजय पाकर बुहनी बनाई। यह जनसंघ के नाम से ही सही लेकिन भाजपा की पहली जीत थी। उसके बाद से भाजपा प्रगति करती रही, लेकिन कभी अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी। न ही भाजपा कोई ऐसा चेहरा देने में सफल रही, जो बिहार के लोगों के दिल-दिमाग में छा जाय। इसी कारण बिहार में भाजपा किसी वैशाखी के सहारे चलने को मजबूर है।
1962 के चुनाव में जनसंघ को कुल 273,355 वोट मिले थे। 2.77 प्रतिशत वोट के साथ जनसंघ ने तीन सीटों पर विजय प्राप्त की थी। जितने वाले उम्मीदवारों में सीवान सीट से जनार्दन तिवारी, हिलसा सीट से जगदीश प्रसाद और नवादा सीट से गौरीशंकर केसरी थे। फरवरी 1967 में हुए चुनाव में भारतीय जनसंघ के सीटों और वोट में काफी उछाल आया। अचानक तीन सीटों वाली जनसंघ ने 23 सीटों की उछाल के साथ 26 सीटों पर जीत हासिल कर ली। उस चुनाव में जनसंघ को 1,410,722 वोट मिले थे, जो कुल मत का 10.42 प्रतिशत था।

1969 के चुनाव में दूसरे नम्बर की पार्टी थी जनसंघ

1967 के दो साल बाद 1969 में ही बिहार में पुन: चुनाव हो गया। उस चुनाव में भारतीय जनसंघ कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गयी। कांग्रेस को कुल 30.46 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि जनसंघ 2, 345, 780 वोट के साथ कुल वोट का 15.63 प्रतिशत पायी थी। उस समय जनसंघ को कुल 34 सीटें मिली थी। हालांकि सीटों के लिहाज से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी 52 सीटें जीतकर दूसरे नम्बर की पार्टी बनी थी, लेकिन उसे कुल वोट का 13.68 प्रतिशत मत ही मिले थे और उस हिसाब से वह तीसरे नम्बर की पार्टी थी।

1972 में कम हुआ पार्टी का वोट प्रतिशत

मार्च 1972 में हुए चुनाव में जनसंघ का वोट प्रतिशत एक बार पुन: गिर गया और 2,007,314 मत मिले थे और यह कुल पड़े मत का 11.69 प्रतिशत था। इसके साथ ही उसके 25 विधायकों को विजय मिली थी। 1977 के विधान सभा चुनाव में जेपी आंदोलन का प्रभाव जबरदस्त देखने को मिला था। विपक्षी पार्टियों ने एकजुटता दिखायी थी, जिसके तहत जनता पार्टी के लोकदल गुट को बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के मुख्यमंत्री का पद मिलना था। वहीं जनसंघ को मध्यप्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में सीएम पद जीत का बाद तय किया गया था। बिहार में जनता पार्टी ने 311 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी और सरकार बनाया। समझौता के तहत जनसंघ ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे।

1980 में भाजपा का जन्म, 21 सीटों पर मिली थी विजय

इसके बाद 31 मई 1980 को बिहार में विधानसभा चुनाव हुआ। इस चुनाव से पूर्व ही जनसंघ की जगह 6 अप्रैल 1980 को ही भारतीय जनता पार्टी का गठन हो गया था। गठन के बाद पहली बार चुनाव लड़ने वाली भाजपा को बिहार में 8.41 प्रतिशत वोट मिले थे। यह चुनाव आपात काल के बाद हुआ था। बहुत उथल-पुथल की स्थिति थी। बिहार में आपात काल की ज्वाला में तप कर कई युवा चेहरा उभरे थे। ऐसी परिस्थिति में हुए चुनाव में भाजपा को कुल 1,891325 मत मिले थे और विधानसभा में 21 सीटों को जीतने के साथ ही भाजपा चौथे नंबर की पार्टी थी।

1985 में 234 सीटों पर लड़ी थी भाजपा, 1990 में 39 सीटों पर विजय

वहीं 1985 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 234 सीटों पर चुनाव लड़कर 7.54 प्रतिशत मत के साथ 16 सीटों पर चुनाव जीते। भाजपा का कुल मत 1,833,275 था। इस दौर में अब राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी। भाजपा अब मंदिर आंदोलन को लेकर आगे बढ़ रही थी। 1990 के चुनाव में राम के भरोसे चल रही भाजपा को 23 सीटों का लाभ हुआ और 237 सीटों पर चुनाव लड़कर 39 सीटों पर विजय प्राप्त की। 4.07 प्रतिशत वोट बढ़ने के साथ ही भाजपा को 11.61 प्रतिशत मत मिले थे।

1995 में के चुनाव में 41 सीटों पर लहराया था परचम

1995 में बिहार में यशवंत सिंहा भाजपा के चर्चित चेहरा बनकर उभरे थे। उस समय भाजपा ने 315 सीटों पर चुनाव लड़कर पिछले चुनाव की अपेक्षा दो सीटों की बढ़ोत्तरी करते हुए कुल 41 सीटों पर विजय प्राप्त की। कुल 4,480, 363 मत पाते हुए भाजपा बिहार में दूसरे नम्बर की पार्टी बनी थी। इसको कुल पड़े मतों का 12.96 प्रतिशत मत मिले थे।

2000 में चेहरा थे सुशील मोदी, 67 सीटों पर मिली विजय

2000 में हुए चुनाव में भाजपा के चेहरा सुशील मोदी थे। इस चुनाव में कुल 67 सीटों पर विजय प्राप्त करते हुए भाजपा ने कुल पड़े मत का 14.64 प्रतिशत मत प्राप्त किया था। उसको कुल मत 5,424,687 मत मिले थे और यह पुन: नम्बर दो की पोजिशन में थी। 2005 के चुनाव में नीतीश के साथ गठबंधन में 103 सीटों पर चुनाव लड़कर भाजपा ने कुल 37 सीटों पर विजय प्राप्त की। इसे कुल मत 268,6290 मिले थे, जो कुल पड़े मत का 10.97 प्रतिशत था। पुन: 2010 फरवरी में भाजपा ने 102 सीटों पर चुनाव लड़कर 55 सीटें जीत ली और दूसरे नंबर की पार्टी बन गयी। भाजपा को पिछले चुनाव की अपेक्षा 18 सीटें अधिक मिली थीं। कुल पड़े मत को इसे 15.65 प्रतिशत मिला था।

2010 में नाराज हो गये थे भाजपा के बिहार अध्यक्ष

2010 के हुए चुनाव में बड़ा उथल-पुथल का दौर था। फरवरी के बाद पुन: अक्टूबर में चुनाव कराने पड़े थे। बिहार भाजपा में भी जनाक्रोश था। बिहार भाजपा के अध्यक्ष सीपी ठाकुर ने अपने बेटे विवेक ठाकुर का टिकट न मिलने पर चुनाव प्रचार करने से मना कर दिया था। इन सबके बावजूद भाजपा को बढ़त मिली और 36 सीटों की बढ़ोत्तरी करते हुए भाजपा ने 102 सीटों पर चुनाव लड़कर 91 सीटों पर विजय प्राप्त की। 16.49 प्रतिशत मत के साथ भाजपा को कुल 47,90,436 मत मिले थे।

2015 में शुरु हुआ नरेन्द्र मोदी का दौर, नीतीश हुए अलग

2015 के विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी का दौर शुरु हो गया था। नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी के कारण ही भाजपा से गठबंधन तोड़ने की बात कर दी थी। भाजपा ने भी अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय कर लिया था। चुनाव परिणाम आये तो 24.4 प्रतिशत वोट शेयर के साथ भाजपा पहले स्थान पर रही। हालांकि पिछले चुनाव की अपेक्षा चुनाव की अपेक्षा इसको 38 सीटों का नुकसार हुआ था और यह 157 सीटों पर चुनाव लड़कर 53 सीटों पर ही विजय प्राप्त कर सकी थी। इसके एनडीए गठबंधन में लोकजनशक्ति पार्टी को दो सीट, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को दो सीट और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा को एक सीट पर विजय मिली थी।

फिर नीतीश आये भाजपा के साथ

2020 के चुनाव में पुन: नीतीश भाजपा के साथ आ चुके थे। इस चुनाव में चुनावी पंडित यह अनुमान लगा रहे थे कि एनडीए की सरकार इस बार बन नहीं पाएगी, लेकिन हुआ उल्टा, पुन: एक बार नीतीशे सरकार आ गयी। इस चुनाव में 110 सीटों पर चुनाव लड़कर भाजपा ने 74 सीटें जीतीं थी और इसका जीतने का स्ट्राइक रेट भी काफी ऊपर 65 प्रतिशत रहा। वहीं नीतीश की जेडीयू ने 115 सीटों पर चुनाव लड़कर 43 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। भाजपा को कुल 82,02,067 मत मिले थे, जो कुल पड़े मत का 19.46 प्रतिशत रहा। पिछले चुनाव की अपेक्षा इसके 21 सीटों की बढ़ोत्तरी हुई थी।

इस बार फिर कमर कस चुके सभी दल

अब इस वर्ष होने वाले चुनाव के लिए सभी पार्टियां छह माह पूर्व से ही कमर कस चुकी हैं। प्रचार में तेजी आ चुकी है। अभी अधिसूचना जारी नहीं हुई, लेकिन सभी चुनावी दल पुरा चुनावी मोड में हैं। यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा कि कौन कितना पानी में रहा। अभी यही कहा जा सकता है कि बिहार में बिना नाविक के भी भाजपा का प्रदर्शन ठीक रहा है, हालांकि आज तक वह कभी मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं दे पायी है।

भाजपा सर्वसमाज में सर्वमान्य

बिहार के भाजपा प्रदेश सचिव संतोष रंजन राय ने कहा कि आज की भाजपा सर्व समाज में सर्वमान्य हो चुकी है। यह किसी एक बिरादरी की पार्टी नहीं है। हर वर्ग के लोग भाजपा के विचारों से सहमत दिखते हैं। यहां हर व्यक्ति स्व की अपेक्षा राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानता है। उसका अपना कुछ नहीं, सब कुछ राष्ट्र विकास के लिए समर्पित है। यही कारण है कि हमारी पार्टी में मैं नहीं, हम की भावना से काम होता है।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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