जहानाबाद: विधानसभा चुनाव को लेकर इन दिनों सरगर्मी काफी तेज है। सभी राजनीतिक दल अपने स्तर से दावे और वादे करने में जुटे हुए हैं। लेकिन एक ऐसी परियोजना है, जिसके निर्माण को लेकर आंदोलन चलाने वाले जगदेव प्रसाद को ‘बिहार का लेनिन’ कहा गया था, फिर भी दुर्भाग्य से आज तक किसानों को उसका लाभ नहीं मिल सका है। यह कहानी 80 के दशक में शुरू हुई थी, जो आज तक अधूरी है। यही कारण है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में भी यह बड़ा मुद्दा बन गया है।
दरअसल, औरंगाबाद जिले के गोह विधानसभा क्षेत्र में पुनपुन नदी पर महेश पारसी हमीदनगर के पास बैराज निर्माण को लेकर जगदेव प्रसाद ने आंदोलन शुरू किया था। उनका आंदोलन इतना प्रभावशाली था कि उसकी आवाज दिल्ली तक पहुंच गई। 5 जनवरी 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद महेश पारसी हमीदनगर पहुंचीं और दलबल के साथ बैराज की आधारशिला रखी। लेकिन उसके कुछ ही समय बाद इंदिरा गांधी की हत्या हो गई, जिसके बाद यह परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई। हालांकि, आंदोलन जारी रहा।
जब बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार बनी, तो उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु जगदेव प्रसाद के सपने को साकार करने की पहल की। 10 अक्टूबर, 1997 को लालू प्रसाद तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री जनेश्वर मिश्रा के साथ हमीदनगर आए और परियोजना की आधारशिला पुनः रखी। इसके बाद बैराज का निर्माण कार्य शुरू हुआ, जो काफी पहले पूरा भी हो चुका है। लेकिन यहां से नहरें नहीं निकाली गईं, जिसके कारण खेतों तक पानी पहुंचाने की योजना अब तक अधूरी है।
बैराज से निकलने वाली नहर का रूट
बराज से निकलने वाली नहर सबसे पहले अरवल जिले के कुर्था विधानसभा क्षेत्र के सेनारी गांव में प्रवेश करती है। नक्शे के अनुसार इसके बाद यह कुर्था विधानसभा क्षेत्र के मंझीयामा, बड़कागांव, बेनीपुर होते हुए जहानाबाद विधानसभा क्षेत्र के रतनी फरीदपुर प्रखंड के कंसुआ गांव में प्रवेश करती है। यहां से यह धरमपुर, सेंधवा होते हुए लगभग 45.80 किलोमीटर की दूरी तय कर पटना जिले के मसौढ़ी तक पहुंचती है। अगर यह परियोजना नक्शे से निकलकर पूरी तरह जमीन पर उतारी जाती, तो कुर्था, जहानाबाद और मसौढ़ी विधानसभा क्षेत्रों के लगभग 13,680 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई संभव हो सकती थी।
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नहर निर्माण में आ रही बाधाएं
परियोजना के आंदोलन से जुड़े किसान नेता मिथिलेश शर्मा बताते हैं कि नहर निर्माण में सबसे बड़ी बाधा सरकार की नीतियां रही हैं। भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी के कारण कई किसानों ने अधिकारियों के निर्णय के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। किसानों द्वारा भूमि अधिग्रहण में अनियमितता के कई आरोप लगाए गए, जिसके परिणामस्वरूप परियोजना अधर में लटक गई।
इस महत्वाकांक्षी सिंचाई परियोजना की समस्या को सुलझाने में स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। नतीजतन, जगदेव प्रसाद का नारा “पुनपुन में बांध बनाएंगे, मछली-भात खिलाएंगे” आज भी अधूरा सपना बना हुआ है। हालांकि, उनके नाम पर लगभग सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते रहे हैं, लेकिन किसानों की इस महत्वाकांक्षी योजना को ईमानदारी से पूरा करने का प्रयास आज तक किसी ने नहीं किया।



