नई दिल्ली: कल्पना कीजिए, वो हरे-भरे खेत जहां नीम की छांव में गाय चरती थी, महुआ के फूलों से महक आती थी, और जामुन के मीठे फल किसान की थाली सजाते थे। लेकिन अब ये दृश्य धुंधला पड़ रहा है। महाराष्ट्र के खेतों से आखिर क्यों गायब हो रहे हैं ये बहुमूल्य पेड़? नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की ताजा रिपोर्ट ने इस सवाल को और गहरा कर दिया है। 2010 से 2024 तक, वन इलाकों के बाहर बिना मंजूरी के 1,65,582 पेड़ काटे गए ज्यादातर कृषि भूमि पर। विभाग ने इन मामलों में जुर्माना वसूला, लेकिन सवाल वही है: क्या ये पर्याप्त है? आइए, इस पर्यावरणीय संकट की परतें खोलते हैं।
एनजीटी की रिपोर्ट: खेतों से ‘हरा सोना’ लुप्त
महाराष्ट्र के प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने 16 अक्टूबर 2025 को एनजीटी में दाखिल अपनी रिपोर्ट में ये चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। राज्य में ट्री फेलिंग रेगुलेशन एक्ट, 1964 के तहत पेड़ काटने पर सख्ती है, लेकिन खेत मालिकों को परिपक्व पेड़ों के लिए अनुमति मिल सकती है। बावजूद इसके, बिना इजाजत कटाई के मामले बढ़ते जा रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि ये पेड़ ज्यादातर वन विभाग के दायरे से बाहर हैं, इसलिए निगरानी मुश्किल। एनजीटी ने 18 मई 2024 को ‘द हिंदू’ अखबार की एक खबर पर खुद संज्ञान लिया था, जिसमें देशभर के खेतों से परिपक्व पेड़ों की तेज गिरावट का जिक्र था। महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे मध्य भारत के राज्यों में ये नुकसान सबसे ज्यादा – 5-10% से कहीं ऊपर।
देशव्यापी संकट: 2018-22 में 53 लाख पेड़ ‘गायब’
ये समस्या सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं। डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 से 2022 के बीच भारत के खेतों से करीब 53 लाख बड़े पेड़ लुप्त हो चुके हैं। हर वर्ग किलोमीटर में औसतन 2.7 पेड़ गायब, लेकिन कुछ इलाकों में तो 50 तक। ये पेड़ जैसे नीम, महुआ, जामुन, कटहल, खेजड़ी, बबूल, शीशम, करंज और नारियल मुकुट क्षेत्र 67 वर्ग मीटर या इससे ज्यादा वाले थे। ये सिर्फ छाया या फल ही नहीं देते, बल्कि मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं, जल संरक्षण करते हैं, और किसानों को लकड़ी, चारा, दवा व अतिरिक्त कमाई का जरिया साबित होते हैं। सैटेलाइट इमेजरी से पता चला कि 2010-11 में दिखे 11% बड़े पेड़ 2018 तक गायब हो चुके।
क्यों कट रहे पेड़? आधुनिक खेती का काला पहलू
‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ जर्नल में छपी एक स्टडी ने इन ‘गायब’ पेड़ों के पीछे के राज खोले हैं। मुख्य वजह? खेती के बदलते नजारे। सिंचाई के साधनों में इजाफा हुआ। खासकर ड्रिप और स्प्रिंकलर ने किसानों को ज्यादा फसल पैदावार का लालच दिया। धान जैसे जल-गहन फसलों के लिए खेतों को साफ करने की होड़ में पेड़ों को ‘बाधा’ माना जा रहा है। नीम जैसे गहरी छांव वाले पेड़ों को फसल की ग्रोथ रोकने वाला समझा जाता है। स्टडी कहती है, 2018-22 में 5.6 मिलियन से ज्यादा बड़े पेड़ (67 वर्ग मीटर मुकुट वाले) गायब हुए, ज्यादातर खेती की इन नई प्रथाओं की वजह से। नतीजा? मिट्टी का कटाव बढ़ा, जैव विविधता घटी, और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की क्षमता कम हुई।
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क्या करें? किसान-पर्यावरण का बैलेंस कैसे बने
विशेषज्ञों का मानना है कि एग्रोफॉरेस्ट्री को बढ़ावा देकर ये नुकसान रोका जा सकता है। सरकार को नीतियां सख्त करनी हों। अनुमति प्रक्रिया आसान लेकिन पारदर्शी, और किसानों को पेड़ों के फायदों की ट्रेनिंग। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जहां नुकसान सबसे ज्यादा है, लोकल कैंपेन चलाकर जागरूकता फैलाई जा सकती है। याद रखें, एक पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं, वो किसान की कमाई, मिट्टी का रक्षक और हवा का शुद्धिकर्ता है। ये आंकड़े चेतावनी हैं कि अगर यूं ही चला, तो आने वाले सालों में खेत बंजर हो जाएंगे। आप क्या सोचते हैं कि पेड़ बचाने के लिए किसान क्या कदम उठा सकते हैं? कमेंट्स में शेयर करें और इस स्टोरी को वायरल बनाएं ताकि नीति-निर्माता सुनें।



