लकड़ी की काठी, काठी का घोड़ा…

अपने देश की भाषा, रवायत, रंग-रूप बेशक अलग है, लेकिन सब में एकता अनूठी है। NewG India देश की अनेकता को एकता के धागे में पिरोने वाली कहानियां आपके सामने ला रहा है। इस सीरीज के पहले अंक में हम बात करेंगे, लोक मनोरंजन के अहम साधन रहे कठपुतली व उसके इतिहास की। इसे मानव जाति के सबसे सरल आविष्कारों में से माना जाता है। वह भी ऐसा, जो रोते हुए को भी हंसा देता है।

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नई दिल्ली: अपना देश संस्कृति और कला में इतना विराट है, जिसकी कल्पना भी मुमकिन नहीं है। इसका इतिहास बहुआयामी व पुराना है और कला रोमांचकारी है। इन्हीं कलाओं में एक है, सहस्राब्दियों पुरानी कठपुतली कला। इसका जिक्र पाणिनी की अष्टाध्यायी में हुआ है। इसके नट सूत्र में पुतला नाटक है। यहीं से कठपुतली के सफर की शुरुआत मानी जाती है।

पौराणिक कथाएं बताती हैं कि भगवान शिव ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहलाया। भगवत गीता में ईश्वर को सत्, रज और तम रूपी तीन सूत्रों से ब्रह्मांड का नियंत्रण करने वाले कठपुतली के सूत्रधार के रूप में वर्णित किया गया है। इसमें यही कला सामने आई थी। इस लिहाज से कठपुतली नृत्य भारतीय संस्कृति में धर्म से भी जुड़ जाता है। पुराता​त्विक साक्ष्य इस कला को सिंधु सभ्यता तक ले जाते हैं।

इसके दो शहरों हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में कठपुतली सरीखे अवशेष मिले हैं। इसके रंगमंच के कुछ संदर्भ 500 ईसा पूर्व के हैं। पहली और दूसरी सदी ईसा पूर्व के तमिल ग्रंथ शिलप्पादिकारम और महाभारत में भी कठपुतली का उल्लेख मिलता है। सिंहासन बत्तीसी में भी विक्रमादित्य के सिंहासन की 32 पुतलियों का जिक्र मिलता है।

विदेशों में खूब हुआ खेल

भारत से यह कला रूस, चीन, इंग्लैंड, रूमानिया, चेकोस्लोवाकिया, जापान और अमेरिका समेत दूसरे देश में पहुंची। हर देश ने मनोरंजन की इस लोक कला में अपना हिस्सा भी जोड़ा है। अपनी संस्कृति के हिसाब से इसमें कुछ चीजें शामिल करवा दी हैं। रोमनों ने कठपुतली के खेल के लिए अपना रंगमंच सजा दिया था। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भी वहां की परंपरा में यह जीवित रही।

इटली के पुनर्जागरण काल में यह खेल फिर लोकप्रिय हुआ। इसे यहां पोर्चिनेला और फ्रांस में पोर्चिनेल कहा गया। फ्रांस से यह 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड पहुंचा। यहां इसे पंच नाम दिया गया। जर्मनों के ड्रेसडेन नगर में इसका संग्रहालय भी है और चेकोस्लोवाकिया के प्राग नगर में प्रशिक्षण केंद्र है। यूरोप में कठपुतली कला में निरंतर प्रयोग चल रहा है। इस्लामी देशों में मूर्तियों का विरोध होने की वजह से इस छाया आकृतियों वाला खेल लोकप्रिय हुआ।

फिल्मों में भी हुई इस्तेमाल

मनोरंजन करने के अलावा शिक्षा, विज्ञापन समेत कई क्षेत्रों में भी कठपुतली का इस्तेमाल हुआ है। बॉलीवुड में भी इसका क्रेज कम नहीं है। पुरानी फिल्में तो आम तौर पर इसी विदूषक के माध्यम से बड़ी-बड़ी बातें निर्देशक कहलवा देता था।

कठ और पुतली से निकली कठपुतली

कठपुतली नाम कठ यानी लकड़ी और पुतली यानी गुडिय़ा से निकला है। कठपुतलियों को पारंपरिक पोशाक पहनाया जाता है। प्रदर्शन नाटकीय लोक संगीत के साथ होता है। इनकी एक अनूठी विशेषता पांवों का अभाव है। यानी पैर पूरी तरह से घांघर से ढका होता है। धागा कठपुतली कलाकार की उंगली से जुड़ा होता है।

गुस्ताखी माफ व रेंचो मशहूर

न्यूज चैनल एनडीटीवी का पपेट शो गुस्ताखी माफ और स्टार वन के लाफ्टर शो का रेंचो काफी मशहूर भी हुआ है। एक तरह से एनिमेशन के कलाकार भी इसे ही अपना स्रोत मान कर चलते हैं। मनमोहक कला भारत के साथ विदेशों में भी लोकप्रिय हो रही है। कठपुतली कलाकार को विदेशों में पपेटियर कहा जाता है।

पपेटरी शो का इस्तेमाल राजनीति में भी

इसमें विभिन्न प्रकार के गुड्डे-गुडिय़ों, जोकर समेत राजा-महाराजा, रानी-महाराणी और विदूषक पात्रों को कठपुतलियों के रूप में बनाया जाता है। इसका शो आसानी से लोक में घूम-घूम कर दिखाया जाता है। इसमें सियासत से लेकर तमाम मुद्दों पर नाटकों से लोगों को जागरूक किया जाता है।

सजीव हो उठती कला

कठपुतलियां चलती हैं, नाचती हैं और हर काम ऐसी सफाई से करती हैं, जैसे वह सजीव हों। यह डोर से चलाई जाती है, लेकिन इसका अहसास देखने वाले को नहीं हो पाता। परदे के पीछे से आवाज यूं दी जाती है, मानों गुड़िया अपने आप ही बोल रही हो। चलने वाली डोर बहुत पतली और काली होती है। पृष्ठभूमि का परदा भी काला रहता है। इसलिए डोर दिखलाई नहीं पड़ती।

इन राज्यों में काफी प्रचलित कला

कठपुतली पूरे देश को किस तरह एक करती है, उसको इससे समझा जा सकता है। आंध्र प्रदेश में थोलु बोम्मलता (छाया कठपुतली) और कोय्या बोम्मलता (धागा कठपुतली) नाम से जाना जाता है। असम में यह पुतल नाच है। बिहार में यमपुरी (छड़ कठपुतली) काफी लोकप्रिय है। कर्नाटक में गोम्बा अट्टा (धागा कठपुतली) और तोगालु (छाया कठपुतली) भी लोकप्रिय है। केरल में इसे ओअवा ज्यत्गेर (दस्‍ताना कठपुतली) और तोल पव्वा कुथु (छाया कठपुतली) कहते हैं।

महाराष्ट्र में कलासुत्री बाहुल्या (धागा कठपुतली) और चम्माद्याचे बाहुल्य (छाया कठपुतली) को बच्चे-बूढ़े सभी पसंद करते है। उड़ीसा में कंडी नाच (दस्‍ताना कठपुतली), रबाना छाया (छाया कठपुतली), काठी कुण्डी (छड़ कठपुतली) और गोपलीला कमधेरी (धागा कठपुतली) का उपयोग होता है। राजस्थान में धागा कठपुतली काफी प्रचलन में है। तमिलनाडु में बोम्मलत्तम (धागा कठपुतली) और छाया कठपुतली का अस्तित्व है। पश्चिम बंगाल में इसे पुतुल नाच (छड़), तरेर या सुतोर पुतुल (धागा) और बनेर पुतुल (दस्‍ताना) कहा जाता है।

राजस्थान में सबसे मशहूर

कठपुतली का नाच सबसे ज्यादा राजस्थान में प्रसिद्ध है। वहां पर भाट जाति के लोग रंग- कपड़ों से कठपुतलियां बनाकर उनके हाथ पैर बनाते हैं और धागे के सहारे बांधकर मनोरंजन करते है। इस नाच में गुड्डा- गुडिय़ा, राजा-रानी, हाथी-घोड़ा कपड़े को सिलकर बनाए जाते हैं।

अलग-अलग कठपुतलियां

मुख्य रूप से यह विधा चार प्रकार की है। कोई कलाकार धागे के बल पर नृत्य पेश करता है तो कोई पर्दे के पीछे से छाया चित्र की तरह नचाता है। इसी तरह दास्ताने पर ही नचाया जाता है। कठपुतलियां या तो लकड़ी की होती हैं या पेरिस-प्लास्टर व कागज की लुगदी से। उसके शरीर के भाग इस प्रकार जोड़े जाते हैं कि उनसे बंधी डोर खींचने पर वे अलग-अलग हिल सकें।

1. धागा कठपुतली

धागा कठपुतली शैली प्राचीन और अत्यंत समृद्ध शैली में से एक है। इसमें कठपुतली को अनेक जोड़ युक्त अंग होते है। इसे धागों से पर्दे के पीछे संचालित किया जाता है। कलाकार हाथ में कई तरह के धागे से बंधे कठपुतली का शो प्रदर्शित करते है। राजस्‍थान ही नहीं, उड़ीसा, तमिलनाडु और कर्नाटक में यह शैली काफी लोकप्रिय है। इन राज्यों में यह शैली लोकप्रिय है इसका मतलब यह स्पष्ट है कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक कठपुतली नृत्य मशहूर है।

2. छाया कठपुतली

छाया कठपुतलियां आकार में चपटी होती हैं। यह चमड़े से भी बनाई जाती हैं। इन्हें पर्दे के पीछे से संचालित कलाकार करते है। दर्शक पर्दे के दूसरे तरफ से छाया कृतियों को देखते हैं। यह प्रकाश के प्रदीप्त होने से किसी अन्य पर्दे पर दिखाई देती है। इसमें रंग-बिरंगे प्रकाश को प्रदीप्त किया जाता है। यह शैली केरल, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र राज्य में काफी लोकप्रिय है।

3. दस्‍ताना कठपुतली

दस्ताना कठपुतली शैली को हथेली पुतली भी कहा जाता है। इस शैली में अंगूठे और दो उंगलियों की सहायता से कठपुतलियों को नचाया जाता है, जिससे कठपुतली सजीव हो उठती हैं। इस शैली में कठपुतली के ऊपरी हिस्से को कपड़े या लकड़ी से बनाया जाता है। गर्दन के नीचे से दोनों हाथ कठपुतली के बाहर निकला होता है। पूरे शरीर के नाम पर एक लहराता घाघरा होता है। उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल और केरल में दस्ताना कठपुतली का काफी लोकप्रिय है।

4. छड़ कठपुतली

दस्ताना कठपुतली की तरह ही छड़ कठपुतली को भी नचाया जाता है। हालांकि यह कठपुतली आकार में काफी बड़ी होती है। इसे छड़ पर खड़ा रखा जाता है। यह कला पश्चिमी बंगाल और उड़ीसा के लोगों में काफी लोकप्रिय है।

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