नई दिल्ली | श्रीलंका में खेले गए ट्राई-नेशन सीरीज के फाइनल से पहले 15 वर्षीय वैभव सूर्यवंशी पर काफी उम्मीदें थीं। हालांकि टूर्नामेंट के शुरुआती चार मैचों में उन्होंने 14, 44, 21 और 38 रन बनाए थे, लेकिन वह बड़ी पारी नहीं खेल पाए थे जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी। उनका स्ट्राइक रेट अच्छा था, लेकिन बड़ा स्कोर नहीं आ रहा था।
कम उम्र में जब हर कोई आपसे शानदार प्रदर्शन की उम्मीद करने लगे, तो मानसिक दबाव भी बढ़ जाता है। फाइनल मुकाबले से पहले भारत-ए के कोच हृषिकेश कानितकर ने वैभव से सिर्फ एक बात कही— “अपना स्वाभाविक खेल खेलो और ज्यादा मत सोचो।”
कोच की यह छोटी सी सलाह वैभव के लिए बेहद खास साबित हुई। फाइनल में उन्होंने श्रीलंका-ए के गेंदबाजों पर शुरू से ही आक्रामक हमला बोला। वैभव ने सिर्फ 29 गेंदों में 94 रन बनाए, जिसमें 10 चौके और 8 छक्के शामिल थे। उनका स्ट्राइक रेट 324 से भी ज्यादा रहा।
वैभव शतक से केवल 6 रन दूर रह गए, लेकिन उन्होंने एक बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। उन्होंने सिर्फ 11 गेंदों में अर्धशतक पूरा किया, जो लिस्ट-ए क्रिकेट के इतिहास का सबसे तेज अर्धशतक है। इससे पहले यह रिकॉर्ड श्रीलंका के कौशल्या वीररत्ने के नाम था, जिन्होंने 12 गेंदों में फिफ्टी लगाई थी।
मैच के बाद वैभव ने बताया कि शुरुआत में वह परिस्थितियों के हिसाब से खेलने की कोशिश में जरूरत से ज्यादा सोचने लगे थे। श्रीलंका की पिचें आईपीएल जैसी नहीं थीं और वहां बल्लेबाजी के लिए अलग रणनीति की जरूरत थी। इसी वजह से वह अपने स्वाभाविक खेल से थोड़ा दूर हो गए थे।
वैभव ने कहा कि जब रन नहीं बन रहे थे, तब उन्होंने कोच हृषिकेश कानितकर से बात की। कोच ने उन्हें खुलकर खेलने और अपने खेल पर भरोसा रखने की सलाह दी। यही सलाह उनके लिए मैच का टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
टूर्नामेंट के शुरुआती मुकाबलों में उनके प्रदर्शन को लेकर सवाल उठ रहे थे, लेकिन फाइनल में खेली गई इस विस्फोटक पारी ने सभी आलोचनाओं का जवाब दे दिया।
वैभव सूर्यवंशी की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उनकी आक्रामक बल्लेबाजी नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में भी अपने खेल और खुद पर भरोसा बनाए रखना है। फाइनल में उन्होंने दिखा दिया कि जब उन्हें खुलकर खेलने का मौका मिलता है, तो वह किसी भी गेंदबाजी आक्रमण पर भारी पड़ सकते हैं।



