तेल रिफाइनरी में लगी आग का धुआं कितना खतरनाक? जानिए फेफड़ों और दिल पर असर

तेल रिफाइनरी में आग लगने की घटनाएं केवल औद्योगिक हादसे नहीं होतीं, बल्कि इनका असर सीधे तौर पर आम लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के जिलॉन्ग शहर में एक बड़ी रिफाइनरी में लगी आग के बाद हवा में फैले घने धुएं ने आसपास के निवासियों की चिंता बढ़ा दी है।

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सिडनी: तेल रिफाइनरी में आग लगने की घटनाएं केवल औद्योगिक हादसे नहीं होतीं, बल्कि इनका असर सीधे तौर पर आम लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के जिलॉन्ग शहर में एक बड़ी रिफाइनरी में लगी आग के बाद हवा में फैले घने धुएं ने आसपास के निवासियों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकतर स्वस्थ लोगों के लिए इसका दीर्घकालिक खतरा सीमित होता है, लेकिन अल्पकालिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

धुएं में क्या होता है?

रिफाइनरी में आग लगने पर निकलने वाला धुआं कई प्रकार के प्रदूषकों का मिश्रण होता है। इसमें PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण शामिल होते हैं, जो इतने छोटे होते हैं कि सांस के जरिए सीधे फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और बेंजीन जैसे विषैले तत्व भी वातावरण में फैल जाते हैं।ये कण और गैसें हवा में लंबे समय तक बनी रह सकती हैं और दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच सकती हैं, जिससे व्यापक क्षेत्र की वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है।

स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है?

ऐसे धुएं के संपर्क में आने पर लोगों को आंखों में जलन, पानी आना, गले में खराश, खांसी, सिरदर्द और सीने में जकड़न जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ये लक्षण आमतौर पर अस्थायी होते हैं और हवा साफ होने के साथ धीरे-धीरे कम हो जाते हैं। हालांकि, लंबे समय तक या बार-बार संपर्क में रहने पर फेफड़ों और हृदय से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। विशेष रूप से उन लोगों में जो पहले से ही प्रदूषण के उच्च स्तर वाले वातावरण में रहते हैं।

कौन हैं ज्यादा जोखिम में?

विशेषज्ञों के अनुसार, अस्थमा या सीओपीडी जैसी श्वसन संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए यह धुआं ज्यादा खतरनाक हो सकता है। इससे उनकी सांस फूलने, खांसी बढ़ने और दवाओं की आवश्यकता बढ़ सकती है। दिल के मरीजों के लिए भी यह स्थिति गंभीर हो सकती है, क्योंकि वायु प्रदूषण हृदय पर अतिरिक्त दबाव डालता है। इससे सीने में दर्द, अनियमित धड़कन या हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है।

बुजुर्ग और बच्चे भी इस श्रेणी में आते हैं। बच्चों के फेफड़े अभी पूरी तरह विकसित नहीं होते, जबकि बुजुर्गों में पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं उन्हें अधिक संवेदनशील बना देती हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए भी बार-बार या लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहना जोखिम भरा हो सकता है।

क्या कैंसर का खतरा है?

ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर लोगों के मन में कैंसर को लेकर डर पैदा होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि एक बार के सीमित संपर्क से कैंसर का खतरा बहुत कम होता है। आमतौर पर यह जोखिम उन लोगों में अधिक देखा जाता है जो वर्षों तक रिफाइनरी या अत्यधिक प्रदूषित वातावरण में काम करते हैं।

बचाव के उपाय क्या हैं?

यदि आसपास के क्षेत्र में धुआं बना हुआ है, तो सबसे जरूरी है कि लोग बाहर कम से कम समय बिताएं। घर के अंदर रहकर खिड़कियां और दरवाजे बंद रखना चाहिए, ताकि बाहरी प्रदूषित हवा अंदर न आए।

एयर कंडीशनर का उपयोग करते समय उसे रीसर्कुलेशन मोड पर रखना फायदेमंद हो सकता है। बाहर निकलते समय अच्छी गुणवत्ता वाले N95 या P2 मास्क का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि ये सूक्ष्म कणों को काफी हद तक रोक सकते हैं। जिन लोगों को पहले से श्वसन संबंधी बीमारी है, उन्हें अपनी दवाएं साथ रखनी चाहिए और लक्षण बढ़ने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे हादसों के बाद घबराने के बजाय सतर्क रहना जरूरी है। वायु गुणवत्ता पर नजर रखना, स्वास्थ्य संबंधी लक्षणों को गंभीरता से लेना और समय रहते उचित कदम उठाना ही सबसे प्रभावी बचाव है।

Samiksha Mishra

samiksha.mishra1222@gmail.com

मैं कॉपीराइटर हूँ, जिसे कंटेंट के ज़रिए कहानियाँ गढ़ने और ब्रांड्स की आवाज को मजबूती देने का तीन वर्षों का पेशेवर अनुभव है। शब्दों की सटीकता, रचनात्मकता और पाठकों से जुड़ाव, यही मेरी लेखनी की पहचान है।

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