देर रात का सन्नाटा… शहर की खाली सड़कों के बीच लाखों घरों की खिड़कियों में अब भी रोशनी जल रही है। कोई मोबाइल स्क्रोल कर रहा है, कोई लैपटॉप पर काम खत्म कर रहा है, तो कोई बस बिस्तर पर करवटें बदल रहा है। नींद आंखों से कोसों दूर है।
अब यह सिर्फ कुछ लोगों की परेशानी नहीं रह गई, बल्कि धीरे-धीरे पूरे देश की समस्या बनती जा रही है। विश्व निद्रा दिवस के मौके पर आई एक रिपोर्ट ने इस चिंता को आंकड़ों में बदल दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 70 करोड़ लोग पूरी नींद नहीं ले पा रहे हैं। यानी हर दूसरा भारतीय उतनी नींद नहीं सो पाता, जितनी उसके शरीर और दिमाग के लिए जरूरी होती है।
सर्वे में सामने आई चौंकाने वाली तस्वीर
लोकल सर्कल्स द्वारा किए गए सर्वे में देश के 393 जिलों के लगभग 89 हजार लोगों से बातचीत की गई। नतीजे बताते हैं कि करीब 46 प्रतिशत भारतीय रोजाना छह घंटे से भी कम नींद लेते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार एक स्वस्थ व्यक्ति को रोजाना कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद जरूर लेनी चाहिए। लेकिन बड़ी आबादी इस न्यूनतम सीमा तक भी नहीं पहुंच पा रही।
सर्वे के आंकड़ों के अनुसार:
- करीब 42 प्रतिशत लोग 6 से 8 घंटे सो पाते हैं
- लगभग 23 प्रतिशत लोग सिर्फ 4 से 6 घंटे सोते हैं
- इतने ही लोग ऐसे भी हैं जो चार घंटे या उससे कम नींद लेते हैं
यानी देश की बड़ी आबादी लगातार अधूरी नींद के साथ अपनी जिंदगी गुजार रही है।
नींद की कमी से बढ़ सकता है बीमारियों का खतरा
डॉक्टरों के मुताबिक नींद सिर्फ शरीर को आराम देने के लिए नहीं होती, बल्कि यह दिमाग की कार्यप्रणाली से भी गहराई से जुड़ी होती है।
पर्याप्त नींद हमारे ध्यान, याददाश्त, निर्णय क्षमता और भावनात्मक संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोध बताते हैं कि लगातार अधूरी नींद दिमाग के उस हिस्से को प्रभावित कर सकती है जो फैसले लेने और आत्म-नियंत्रण से जुड़ा होता है। लंबे समय तक नींद की कमी से दिल की बीमारियों, डायबिटीज और मेटाबोलिक समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है।
क्या सिर्फ मोबाइल फोन है वजह?
अक्सर लोग नींद की कमी के लिए मोबाइल फोन और सोशल मीडिया को जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस सोच को चुनौती दी है।
प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल Journal of the American Medical Association में प्रकाशित शोध के अनुसार, करीब 1.21 लाख हाई स्कूल छात्रों के आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि 2023 में लगभग 75 प्रतिशत किशोर पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे थे।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि बहुत कम नींद लेने वाले किशोरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
- 2007 में करीब 15.8 प्रतिशत किशोर पांच घंटे या उससे कम सोते थे
- 2023 तक यह आंकड़ा बढ़कर करीब 23 प्रतिशत हो गया
विशेषज्ञों का कहना है कि किशोरावस्था में नींद दिमाग के विकास, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक संतुलन के लिए बेहद जरूरी होती है।
बदलती जीवनशैली भी जिम्मेदार
रिसर्च बताती है कि समस्या सिर्फ स्क्रीन टाइम नहीं है।
विशेषज्ञों के मुताबिक स्कूल का बहुत जल्दी शुरू होना, पढ़ाई का बढ़ता दबाव, प्रतियोगिता, अतिरिक्त गतिविधियां और मानसिक तनाव भी बच्चों और किशोरों की नींद को प्रभावित कर रहे हैं।
यह समस्या सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं है। वयस्क भी इसी संकट से जूझ रहे हैं। भागदौड़ भरी जिंदगी, दफ्तर का बढ़ता काम, रात-रात भर मोबाइल नोटिफिकेशन और तनाव ने लोगों की नींद का संतुलन बिगाड़ दिया है।
दुनिया में बढ़ रहा ‘स्लीप टूरिज्म’
नींद की कमी के चलते अब दुनिया भर में एक नया ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है—Sleep Tourism।
ट्रैवल प्लेटफॉर्म Skyscanner की रिपोर्ट के मुताबिक लोग अब छुट्टियां सिर्फ घूमने के लिए नहीं, बल्कि सुकून भरी नींद लेने के लिए भी प्लान करने लगे हैं।
भारत में ऋषिकेश, जबकि दुनिया में स्विट्जरलैंड, कोस्टा रिका और आइसलैंड जैसी जगहें स्लीप टूरिज्म के लिए लोकप्रिय हो रही हैं। यहां होटल और रिसॉर्ट विशेष स्लीप पैकेज, योग-ध्यान और शांत वातावरण के जरिए बेहतर नींद देने का दावा करते हैं।
असली समाधान हमारी दिनचर्या में
विशेषज्ञों का मानना है कि असली समाधान छुट्टियों में नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की जीवनशैली में छिपा है।
अगर हम नियमित व्यायाम करें, रात में हल्का भोजन लें, सोने से पहले मोबाइल स्क्रीन से दूरी बनाए रखें और अपनी दिनचर्या संतुलित रखें, तो नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है।
क्योंकि नींद कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक बुनियादी जरूरत है।
और अगर किसी देश की आधी आबादी ही ठीक से नहीं सो पा रही, तो यह सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं बल्कि समाज के भविष्य का भी सवाल बन जाता है।



