पटना: बिहार की राजधानी पटना से करीब 80 किमी की दूरी पर बसे एकवारी गांव से सखुआना नहर गुजरती है। सोन नदी यहां से सात किमी दूर है। भोजपुर जिले का यह गांव साहर ब्लाक में पड़ता है। एकवारी बिहार का इकलौता गांव है, जहां का खूनी इतिहास 1968 तक जाता है। बीते चार दशकों में तो 250 हत्याएं हुईं। इसमें जनसंहार के तौर पर सिर्फ एक बार 15 लोगों को मार डाला गया था।
हत्याओं के अलावा यह वही गांव है, जहां से बिहार में नक्सलवाद की शुरुआत हुई। इसकी नींव रखने वाले जगदीश महतो इसी गांव से थे। 1968 में पहली बार दलितों ने गांव के एक जमीदार को मार डाला था। यह बात रणवीर सेना के गठन के दो दशक पहले की है।
90 के दशक में नक्सलियों ने नारा दिया था, ‘ध्वस्त किया बिहटा और एकवारी, अबकी बार बेलाउर की बारी।’ इसका जवाब रणवीर सेना ने इस नारे से दिया, ‘ना बिहटा, ना एकवारी, अबकी बार माले के भूत बेलाउर झारी।’ लेकिन इससे बहुत पहले उच्च जातियों व निचली जातियों के बीच हिंसक वारदातें शुरू हो गई थीं।
भूमि समाज व्यवस्था का आधार
क्रूर जातीय हिंसा पर जाने से पहले बिहार की समाज व्यवस्था पर बात करना जरूरी है। असल में बिहार की जो समाज व्यवस्था है, उसकी मूल कड़ी भूमि अधिकार से जुड़ती है। भूमिहार सरीखी ऊंची जातियों के पास ज्यादा जमीन थी। जमीदारों में भी इनका वर्चस्व था। यही लोग समाज के ऊपरी पायदान पर थे। इसका दूसरा सिरा, निचला पायदान भूमिहीनों से जुड़ता है। इनमें दलितों की संख्या सबसे ज्यादा थी। हिंसक जातीय संघर्ष की बुनियाद में यही दो सिरे आपस में भिड़ते रहे। हिंसक मुठभेड़ में ऊंची और निचली जातियां आमने-सामने होती रही हैं। इस संघर्ष की शुरुआत माओ के वर्ग संघर्ष की थ्योरी से होती है। लेकिन जातियों में बंटे बिहार में वर्ग संघर्ष पूरी तरह से जातीय संघर्ष में बदल गया। इसके एक सिरे पर रणवीर सेना जैसी सेनाएं थीं, और दूसरा सिरा नक्सलियों के हाथ चला गया।
करीब एक दशक पहले बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में पटना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विनय कंठ ने बताया था, ‘बिहार में जब तक शोषण जिंदा रहेगा, एक खास तरह का ‘आइडियोलॉजिकल फोर्स’ बना रहेगा। जिस समय रणवीर सेना और दूसरी जातिगत सेनाएं उभर रही थीं, सरकारें निष्क्रिय थीं।….. उस वक्त पुलिस की भूमिका भी निष्क्रिय थी। इसलिए दोनों के बीच सीधा टकराव हुआ।’
एकवारी की पहली हत्या 1968 में
खैर, लौटते हैं एकवारी गांव में, जहां हत्याओं को सिलसिला 1968 में उस वक्त शुरू हुआ, जब भूमिहार समाज के दूधड़ सिंह की हत्या हुई थी। दूधड़ सिंह एक बड़े जमींदार थे। इसके दो वर्ष बाद फिर विश्वनाथ सिंह की हत्या कर दी गयी। इसके बाद से एकवारी में हत्याओं का सिलसिला चलता रहा। यह सिलसिला 2022 में माले द्वारा के मदन सिंह की हत्या तक जाता है। इसके बाद अभी तीन सालों से रुका हुआ है, लेकिन कब आग सुलग जाये, यह कहा नहीं जा सकता है।
नथुनी सिंह की हत्या के बाद उठी चिंगारी
एकवारी गांव के निवासी संजय कुमार शर्मा बताते हैं, 1975 से हालात बेकाबू हो गए थे। इसी साल गांव के सबसे बड़े परिवार उमा शंकर सिंह के बाबा नथुनी सिंह की हत्या कर दी गई। आरोप नक्सलियों पर लगा था। प्रतिशोध में भूमिहीन कहार जाति के ब्रह्म हलुवाई की हत्या की गयी। इसके बाद दोनों तरफ से कब, कौन और कहां मार दिया जाएगा, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था। बाद के पांच दशक में इतनी लाशें गिरीं कि गांव वाले भी सही-सही नहीं गिन सके।
24 घंटे लगातार चली थी गोली
संजय कुमार शर्मा 1989 की एक घटना का जिक्र करते हैं। उनके मुताबिक, एक बार माले के लोगों ने पूरे गांव को घेर लिया। गांव में ऊंची जातियों के लोग भी पहले से सजग थे। इन लोगों ने बाहर से भी कुछ लोगों को बुला लिया था। इससे दोनों तरफ से लगातार 24 घंटे गोली चलती रही। यह संयोग था कि उसमें ज्यादा जनहानि नहीं हुई, लेकिन अशोक सिंह को इसमें जान गंवानी पड़ी। उस घटना के बाद माले के 92 लोग गिरफ्तार हुए, फिर भी हत्याओं का सिलसिला नहीं थमा।
उमाशंकर सिंह के चार भाइयों की हुई हत्या
1992 में गांव के ही उमाशंकर सिंह अपने पूरे परिवार के साथ खेत पर काम करा थे। उसी समय माले वालों ने घेर लिया। उस घटना में उमा शंकर सिंह के परिवार के छह सदस्य घायल हुए, जिसमें चार लोगों की मौत हो गयी। उस समय तक भूमिहार भी एकजुट होते जा रहे थे। इस घटना के बाद भूमिहारों ने 1995 में माले के 15 लोगों की सामूहिक हत्या की। यही इस गांव का एकमात्र सामूहिक नरसंहार है।
महतो का रामेश्वर व राम नरेश ने दिया साथ
एकवारी गांव के जगदीश महतो ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने पहली बार पश्चिम बंगाल से नक्सलवाद को बिहार तक पहुंचाया। इन्होंने गुरिल्ला युद्ध की शुरुआत की थी। उनको साथ रामेश्वर अहीर और रामनरेश राम का मिला। तीनों ने मिलकर जमींदारों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। सबसे बड़ी बात यह थी कि जाति से कोईरी महतो ने भूमिहीनों में हिंसक प्रतिरोध की राह पर भेज दिया, लेकिन खुद किसी हत्या में शामिल नहीं रहे।
जमींदारों के आतंक से बन गये मार्क्सवादी
जगदीश महतो ऊर्फ मास्टर साहब की शुरुआती शिक्षा एकवारी में हुई। इसके बाद वह पढ़ने आरा चले गए। छपरा से उन्होंने ग्रेजुएशन किया। इसी दौरान उनको युवा जमींदारों से प्रताड़ना झेलनी पड़ती। इससे धीरे-धीरे वह मार्क्सवाद-माओवाद की तरफ चल पड़े। हालांकि, अभी तक उन्होंने हथियार नहीं उठाया था। स्नातक करने के बाद वह 1964 में औरंगाबाद के आम्बा हाई स्कूल में पढ़ाने लगे। इसके बाद उन्होंने जहां से पढ़ाई की थी, उस 1966 में आरा के जैन स्कूल में आ गये। उसी समय 1967 में बिहार विधानसभा चुनाव हो रहा था। उस समय कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया के राम नरेश राम चुनाव लड़ रहे थे। उनका महतो खुलेआम सपोर्ट कर रहे थे।
बूथ कैप्चरिंग के विरोध में हुई पिटाई
वोटिंग के दिन उन्होंने देखा कि एक गांव में जमींदार बूथ कैप्चरिंग कर रहे थे। महतो ने इसका विरोध किया तो जमीदारों जमकर पीटा, जिसके बाद महतो को महीनों अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। उसी समय पश्चिम बंगाल के 1967 में नक्सलियों का उदय हो रहा था। इसी बीच जगदीश महतो कामरेड और नक्सली हिंसा के जनक चारू मजूमदार से मिलने पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी गांव पहुंचे। चारू से मिलने के बाद महतो की विचारधारा बदल गयी और उन्होंने दलितों की आवाज उठाने का संकल्प लिया। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और 20 साल तक वे अंडर ग्राउंड रहकर नक्सलवाद का प्रचार करते रहे।
अंडरग्राउंड रहते हुए अखबार भी निकाला
नक्सलवाद के जानकार और बिहार के वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार का कहना है कि महतो ने प्रत्यक्ष तौर पर जमीदारों का अत्याचार झेला था। इससे उनमें जमींदारों के प्रति कूट-कूट कर नफरत भरी हुई थी। जमींदारों के हमले में ही वह मौत के मुंह में जाते-जाते बचे थे। लेकिन हथियार उठाने में उनके हाथ कांपते थे। इससे वह दूसरों को हथियार उठाने को प्रेरित करते, लेकिन खुद उससे दूर रहते। उनके उत्तेजक भाषणों की देन थी कि दलित समाज के लोग जमींदारों के प्रति विस्फोटक हो गये। नक्सल आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने एक अखबार हरिजन स्थान भी निकाला। इस अखबार में जमींदारों के अत्याचार और मार्क्सवादी विचारधारा के बारे में ही उत्तेजक लेख होते थे।
महतो के आक्रामक भाषणाें से दलितों ने उठाया हथियार!
जानकार बताते हैं कि महतो के भाषण काफी आक्रामक होते थे। माना जाता है कि इसी से दलितों ने पहली बार भूमिहार की हत्या की थी, लेकिन उस समय तक दलितों के पास हथियारों की कमी रही, जिससे अनेक स्थानों पर वे कमजोर पड़ते गये। यही कारण था कि 1970 से 1980 तक बिहार में लगभग नौ नरसंहार हुए, जिसमें पीड़ित पक्ष दलित ही था। इस संबंध में राम प्रवेश का कहना है कि दलितों के पास धन की कमी थी, जिसके कारण वे हथियारों से कमजोर पड़ जाते, फिर उनकी आवाज जमीदारों के खिलाफ मुखर होने लगी थी।
महतो बेगारी प्रणाली के कट्टर आलोचक
महतो अपने जीवन की शुरुआत से जमींदारों द्वारा किसानों के अधीनता के बहुत मुखर विरोधी थे और वह बेगारी प्रथा के कट्टर आलोचक थे। यह एक ऐसी प्रणाली थी, जिसमें कृषक बिना पैसे के जमींदारों के खेतों पर काम (अवैतनिक श्रमदान) करते थे। मास्साहब (नक्सली नेता जगदीश प्रसाद महतो, जो बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘मास्टर साब’ के भी नायक हैं) आज भी भोजपुर के गांवों में जिंदा हैं। हकीकत में महतो दलित वर्ग में वैसे ही जिंदा हैं, जैसे जमीदारों में ब्रह्मेश्वर मुखिया। ब्रह्मेश्वर मुखिया दलित वर्ग के लिए जहां आतताई थे, वहीं भूमिहार समाज के लिए एक मसीहा के रूप में जाने गये। उसी तरह मास्टर साहब दलित वर्ग में एक उद्धारक के रूप में जाने गये।
रहस्यमय रही महतो की हत्या
जगदीश महतो ने जमीदारों के खिलाफ दलित वर्ग को लड़ाई के लिए खड़ा किया, लेकिन दुखद पहलु यह रहा कि जगदीश महतो के मारने में भूमिहीनों का ही हाथ था। बहुत दिनों तक यह कहानी चलती रही कि वे किसी गांव गये थे, जहां भूमिहारों ने उन्हें घेर लिया। वे भागकर दलित वर्ग के टोले में पहुंचे, लेकिन वहां दलितों ने चोर समझकर मार दिया।
लेकिन इसकी एक दूसरे कहानी भी है। संजय शर्मा बताते हैं कि उनको मुसहरों ने घेरकर मार दिया था। उन्होंने क्यों मारा, यह तो नहीं पता चलता है, लेकिन यह बाद में सभी की जानकारी में आ गया कि मुसहरों ने ही उनकी हत्या कर दी। इस तरह से जैसे जमीदारों में सम्मान पाने वाले रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर मुखिया के मर्डर के पीछे किसी सवर्ण का ही हाथ माना जाता है, वैसे ही मास्टर साहब की हत्या के पीछे एक भूमिहीन ही रहा। जगदीश महतो ने अपने अज्ञातवास के दौरान ही अपनी बेटी की शादी श्री भगवान कुशवाहा से की थी, जो आज जदयू से विधायक हैं। उनकी बेटी सचिवालय में काम करती हैं। वहीं उनका लड़के भी पटना में रहते हैं।
आंकड़ों में एकवारी गांव
- 1,877 परिवार और आबादी 11,561। इसमें 5,976 पुरुष और 5,585 महिलाएं हैं।
- औसत लिंगानुपात 1,000 पुरुषों पर 935 महिलाओं का है। यह बिहार राज्य के औसत 918 से थोड़ा ज्यादा है।
- साक्षरता दर 72.98 फीसदी है। जबकि राज्य की साक्षरता दर 61.80% है।
(नोट: 2011 की जनगणना के अनुसार)



