हम संसारी जीव सबको उपदेश देते हैं ,सबको समझाते हैं, पर कभी अपनी ओर नहीं देखते कि हम कितने पानी में हैं। हमें तो कबीर भी याद नहीं आते हैं कि;
बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना मुझ सा बुरा न कोय।।
दूसरे की तरफ अंगुली उठाते हमें यह भी बोध नहीं होता कि एक अंगुली सामने वाले की तरह है तो चार अपनी ओर ही संकेत करती हैं। तुलसीदास पूरी विनय पत्रिका में केवल दास भाव से विनम्र होकर प्रार्थना करते हैं और कुछ सीख सिखावन देना भी हो तो अपने मन को ही देते हैं। फिर चाहे ऐसी मूढ़ता या मन की बात हो या खुद को छोटा खोटा बताने का प्रसंग हो। पद संख्या 87 को जितनी बार पढ़ा जाता है, जितनी बार उसका गायन किया जाता है, उतने ही अर्थ अधिक स्पष्ट होते जाते हैं। राम जप के संदर्भ में वे लिखते हैं;
राम नाम छोड़ जो भरोसा करे और को,
तुलसी परोसा त्याग मांगे कौर कूर को।
सच ही जो रामनाम को छोड़ अन्य का आसरा करते हैं वे निरे मूढ़ हैं जड हैं। और ऐसे मूढ़ मन को तुलसी सिखावन देते हैं। आइए पहले पद पर दृष्टि डालते हैं…..
सुन मन मूढ़! सिखावन मेरो।
हरि पद विमुख लहयों न काहु सुख ,सठ! यह समुझ सबेरो।।1।।
बिछुरे ससि रवि मन नैनन ते,पाबत दुख बहुतेरो।
भ्रमत श्रमित निसि -दिवस गगन मह ,तह रिपु राहु बडेरो।।2।।
यद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुं पुर सुजस घनेरो।
तजे चरण अजहू न मिटत नित, बहिबो ताहू केरो।।3।।
छुटे न विपत्ति भजे बिनु रघुपति, श्रुति संदेह निबेरो।
तुलसीदास सब आस छोड़ कर, होहु राम को चेरो।।4।।
हे मेरे मूढ़ मन तू मेरी बात सुन मेरा कहना मान।
भगवान के चरणों में अपना चित लगा।
जो भगवान के चरण कमलों से विलग होते हैं।
उन्हें कभी सुख नहीं मिला करता।
दुष्ट, इस बात को तू जितनी जल्दी समझ ले उतना ही अच्छा है।
छोड़ मन हरि विमुखन को संग।
जिनके संग कुमति उपजत है परतं भजन में भंग।
जाके प्रिय न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि वैरी सम यद्यपि परम स्नेही।
बार बार समझाते हैं तुलसीदास। और फिर प्रहलाद, विभीषण, भरत, बलि और गोपियों के उदाहरण देते हैं कि देखो, इन सबने माता, भाई, पिता, पति और गुरु जैसे नाते रिश्तों को केवल इसलिए त्याग दिया क्योंकि वे प्रभु राम वैदेही के विरोधी थे। उनका रामनाम में मन नहीं लगता था। जो हरि चरणों से विमुख हैं, उनका कभी कोई सुख नहीं मिलता।
गोस्वामीजी दो उदाहरणों से इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं। खुलासा करते हैं। सूर्य और चंद्र जब से भगवान के नेत्र और मन से अलग हुए हैं, तब से उन्हें बडे़ दुखों का सामना करना पड रहा है। दिन-रात लगातार आकाश में चक्कर लगाते हैं, थक जाते हैं और ऊपर से बडा शत्रु राहु उन्हें ग्रसने के लिए घात लगाये बैठा रहता है। सूर्य चन्द्र ग्रहण इसी का परिणाम है।
पतित पावनी गंगा सुर सरिता कहलाती है। उसका वास ब्रह्मा जी के कमंडल और शिव की जटा में है। तभी जनमानस गाता दोहराता है, शंकर तेरी जटा में बहती है गंगधारा। विष्णु के पैरों से निकास है, इसलिए गंगा विष्णुपदा कही जाती है। तीनों लोकों में उसके यश की बहुत चर्चा है। घर में शुभ और मांगलिक कार्य संपन्न होने पुत्र पुत्रियों के विवाह पश्चात गंगा स्नान का विधान है। ऐसी पतित पावनी गंगा को भी हरि के चरणों से विमुख होने का दंड भोगना पडता है। तब से निरंतर गंगोत्री से गंगा सागर तक अविरल बहती और बहती रहती हैं। उन्हें क्षण भर के लिए भी चैन नहीं मिलता।
रघुपति को भजे बिना विपत्ति से छुटकारा नहीं मिला करता। ऐसा वेदों में वर्णित है और इस बात में रंचमात्र भी संदेह नहीं है। इसलिए तुलसीदास जी बार-बार कहते हैं, सब आस छोड़कर बस राम के चरणकमल की सेवा कर। रात-दिन राम-राम जप। उन्हें ही भज। वही एकमात्र सहारा हैं। कलियुग में केवल और केवल रामनाम का ही आधार है। मूढ जो सब कष्टों से मुक्ति चाहता है तो राम की शरण में आजा। सुन मन मूढ सिखावन मेरो। हरि पदविमुख लह्यो न काहु सुख सठ यह समुझि सवेरो।
लेखक: प्रोफेसर बीना शर्मा, पूर्व निदेशक
केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा



