नई दिल्ली: भारतीय संस्कृति में छठ पूजा (Chhath Puja) एक ऐसा पर्व है जो श्रद्धा, तपस्या और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है। यह चार दिवसीय महापर्व 25 अक्टूबर से 28 अक्टूबर 2025 तक देशभर में उत्साह के साथ मनाया जाएगा। खासकर बिहार, झारखंड और पूर्वांचल में इसकी रौनक देखते बनती है, लेकिन अब यह पूरे भारत में लोकप्रिय हो रहा है। महिलाएं इस पर्व में विशेष रूप से सक्रिय रहती हैं, जो कठिन व्रत और नियमों के साथ सूर्य देव और छठी मैया की पूजा करती हैं।
‘छठ’ नाम का रहस्य
‘छठ’ शब्द का मूल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि से जुड़ा है, क्योंकि यह पर्व छठे दिन मनाया जाता है। यही कारण है कि इसे ‘छठ पूजा’ या ‘सूर्य षष्ठी व्रत’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सूर्य देव और उनकी बहन छठी मैया की पूजा की जाती है। छठी मैया को संतान की रक्षक और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। यह नाम केवल तिथि तक सीमित नहीं, बल्कि यह छठी मैया के प्रति भक्ति और उनके आशीर्वाद का भी प्रतीक है।
धार्मिक महत्व और पौराणिक कथाएं
छठ पूजा का धार्मिक महत्व गहरा है। मान्यता है कि छठी मैया ब्रह्मा जी की मानस पुत्री और सूर्य देव की बहन हैं। भक्त इनसे संतान की सुरक्षा और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं। सूर्य देव को जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व में सूर्य को अर्घ्य देकर भक्त उनकी कृपा मांगते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस व्रत की शुरुआत महाभारत काल में द्रौपदी और पांडवों ने भी की थी, जो कठिन समय में सूर्य और छठी मैया की पूजा से उबरे थे।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
छठ पूजा का वैज्ञानिक महत्व भी कम नहीं है। सूर्य की किरणें विटामिन D का स्रोत हैं, जो हड्डियों और त्वचा के लिए लाभकारी हैं। इस दौरान सूर्य की सीधी किरणें पृथ्वी पर पड़ती है, जो शरीर को ऊर्जा देती हैं। व्रत और नियमित उपवास शरीर को डिटॉक्स करने में मदद करते हैं, जिससे मानसिक और शारीरिक शुद्धता बढ़ती है।
छठ पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति, स्वास्थ्य और आस्था का संगम है। यह पर्व हमें सिखाता है कि श्रद्धा और अनुशासन के साथ जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं। यह भारतीय संस्कृति की एक ऐसी धरोहर है, जो हर पीढ़ी को प्रेरित करती है।



