नई दिल्ली: दही हांडी का रंगारंग पर्व 17 अगस्त 2025 को जन्माष्टमी के अगले दिन पूरे उत्साह के साथ मनाया जाएगा। यह उत्सव भगवान श्रीकृष्ण की नटखट बाल लीलाओं का प्रतीक है, जिसमें गोविंदा की टोलियां मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर लटकी मटकी को फोड़ती हैं और माखन-दही का आनंद लेती हैं।
श्रीकृष्ण की नटखट लीला का उत्सव
पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में नन्हा कृष्ण अपने सखाओं के साथ गोकुल में माखन चुराने के लिए मशहूर था। गोपियां उनकी शरारतों से तंग आकर मटकियों को ऊंचे स्थानों पर लटकाने लगीं। लेकिन चतुर कृष्ण अपने दोस्तों के साथ मिलकर मानव पिरामिड बनाते और मटकी तोड़कर माखन खा लेते। दही हांडी का यह पर्व उसी प्रेममयी और शरारती लीला को जीवंत करता है, जो भक्तों के दिलों को भक्ति और उल्लास से भर देता है।
गोविंदा की टोली और मानव पिरामिड
दही हांडी का उत्सव आज कई शहरों में उत्साहपूर्ण प्रतियोगिताओं के रूप में मनाया जाता है। इसमें गोविंदा या गोपाला की टीमें हिस्सा लेती हैं, जो एकजुट होकर मानव पिरामिड बनाती हैं। जैसे ही मटकी टूटती है, उसमें भरा माखन और दही नीचे गिरता है, और चारों ओर गोविंदा आला रे के नारे गूंजने लगते हैं। यह उत्सव न केवल धार्मिक है, बल्कि यह एकता, मेहनत, और सामूहिक प्रयास का भी प्रतीक है।
सुख-समृद्धि का प्रतीक
मान्यता है कि मटकी से गिरने वाला माखन और दही सुख, समृद्धि और शुभता का प्रतीक होता है। गोविंदा की टोलियां इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं, जिससे उत्सव का आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है। यह पर्व भक्ति, उत्साह और सामुदायिक भावना का अनूठा संगम है, जो हर साल लाखों लोगों को एक साथ लाता है।



