कन्हैया, पप्पू, ओवैसी की तिकड़ी से क्यों किनारा करते हैं तेजस्वी!

बिहार में अधिसूचना जारी होने से पूर्व ही विधानसभा चुनाव अपने शबाब पर है। कभी एआईएमआईएम का विपक्षी महागठबंधन का हिस्सा बनने की कोशिश की चर्चा होती है तो कभी निर्दलीय सांसद पप्पू यादव और कांग्रेस के युवा नेता कन्हैया कुमार से राजद नेता तेजस्वी यादव की दूरी पर अटकलें लगती हैं। सवाल है कि एआईएमआईएम क्यों महागठबंधन से चुनाव पूर्व गठबंधन करना चाहती है और तेजस्वी को पप्पू यादव और कन्हैया पसंद क्यों नहीं हैं?

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नई दिल्ली: बिहार में इसी हफ्ते विपक्षी महागठबंधन का चुनाव आयोग के खिलाफ हल्ला बोल से ज्यादा चर्चा निर्दलीय सांसद पप्पू यादव और कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार के कथित अपमान की हुई। दरअसल इन दोनों नेताओं को उस ट्रक में सवार होने नहीं दिया गया, जिसमें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और तेजस्वी यादव सवार थे। मनाही के बाद कन्हैया कुमार मायूसी में दिखे तो पप्पू यादव बेहद आहत और नाराज नजर आए।
सियासी गलियारे में चर्चा है कि ऐसा तेजस्वी यादव के इशारे पर किया गया। तेजस्वी नहीं चाहते थे कि इन दोनों नेताओं को इस अहम मौके पर अहमियत मिले। इसी प्रकार कांग्रेस की इच्छा के विपरीत तेजस्वी यह भी नहीं चाहते कि महागठबंधन में एआईएमआईएम को शामिल किया जाए। राजद एआईएमआईएम के प्रस्ताव को ठुकरा भी चुकी है।

तिकड़ी से क्यों दूरी बनाए रखना चाहते हैं तेजस्वी?
तेजस्वी का कन्हैया, पप्पू यादव और एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी के प्रति बेरुखी का कारण आधार वोट बैंक में इनकी पकड़ है। तेजस्वी नहीं चाहते कि पार्टी के मूल वोट बैंक पर असर रखने वाला कोई नया चेहरा मजबूत हो। राज्य में यादव और मुसलमान राजद का मूल वोट बैंक है, जिसे पार्टी का एमवाई समीकरण कहा जाता है। इस तिकड़ी का राजद के मूल वोट बैंक और खास कर मुसलमानों में पकड़ है। इनमें पप्पू यादव की सीमांचल और कोसी क्षेत्र के मुसलमानों के साथ यादव बिरादरी में अच्छी पकड़ है। ओवैसी की पार्टी बीते विधानसभा चुनाव में मुस्लिम बाहुल्य सीमांचल में पांच सीटें जीत कर अपने ताकत का अहसास करा चुकी है। जबकि पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा पर सधे तरीके से हमला बोलने के कारण कन्हैया मुसलमानों में बेहद लोकप्रिय हैं।

पप्पू यादव से लगातार दूरी
राज्य की सियासत में पप्पू यादव और राजद सुप्रीमो के बीच अदावत की शुरुआत पार्टी में तेजस्वी के उदय से हुई। कभी लालू की छत्रछाया में सियासत का ककहरा सीखने वाले पप्पू यादव ने विद्रोह कर रास्ता अख्तियार किया। अपनी जन अधिकार पार्टी बनाई। मेलमिलाप के बाद लालू उन्हें मधेपुरा से चुनाव लड़ाना चाहते थे, जबकि पप्पू यादव पूर्णिया से लडऩे पर अड़ गए। खींचतान के बीच उन्होंने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया, मगर राजद ने पूर्णिया सीट अपने कोटे में लेने के बाद जदयू की ताकतवर विधायक रही बीमा भारती को इस सीट पर उम्मीदवार बना दिया। मजबूरन पप्पू यादव निर्दलीय मैदान में उतरे और चुनाव जीते। हालांकि इसके बाद दोनों के बीच खटास और बढ़ गई।

कन्हैया पर भी लगातार वार
तेजस्वी पप्पू यादव की तरह ही कन्हैया कुमार से भी लगातार असहज रहे हैं। कारण कन्हैया मुसलमानों में लोकप्रिय होने के साथ तेजस्वी की तरह युवा भी हैं। उनकी भाषण शैली तेजस्वी से बेहतर है। इसका परिणाम यह हुआ कि 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के बावजूद राजद ने कन्हैया की बेगूसराय सीट पर अपना उम्मीदवार उतारा। बीते चुनाव में बेगूसराय की सीट अपने कोटे में ले लिया। इसके कारण कन्हैया को उत्तर पूर्वी दिल्ली से मैदान में उतरना पड़ा।

औवैसी को भी मानते हैं बड़ा कांटा
लगातार भाजपा की बी टीम का आरोप झेल रहे एआईएमआईएम के मुखिया ओवैसी ने महागठबंधन को सियासी पटखनी देने के लिए इस बार अपनी ओर से चुनाव पूर्व गठबंधन का प्रस्ताव दिया। हालांकि राजद ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। दरअसल तेजस्वी को पता है कि महज मुसलमान की राजनीति करने वाले औवेसी की अगर सीमांचल में मजबूत पैठ बनी तो वह भविष्य में राज्य के उन क्षेत्रों में भी राजद के लिए मुसीबत बन सकते हैं, जहां मुस्लिम आबादी है।

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