नई दिल्ली: बिहार में विधानसभा चुनाव ने दस्तक दे दी है। हर बार की तरह इस बार भी चर्चा मुस्लिम-यादव (एमवाई) समीकरण की है। करीब 31 फीसदी की आबादी वाला यह वोट बैंक राजद की मुख्य ताकत है। राज्य में राजद की डेढ़ दशक की सत्ता का यही वोट बैंक मुख्य आधार रहा है। हालांकि इस चर्चा में नई सदी में अचानक उभरे एमबीसी (36 प्रतिशत) वोट बैंक की चर्चा दब जाती है, जिसके पास वास्तव में राज्य के सत्ता की चाबी है। बीते चार चुनाव में यही वर्ग जनादेश के मामले में तुरुप का इक्का साबित हुआ है।
अब सवाल है कि इस चुनाव में इस वर्ग का क्या रुझान होगा? जाहिर तौर पर जमीनी हकीकत को समझते हुए राजद सत्तारूढ़ राजग के इस मुख्य वोट बैंक में आधार बनाना चाहती है। राजद को पता है कि महज एमवाई समीकरण के सहारे उसकी लड़ाई उसे हमेशा की तरह मुख्य विपक्षी दल का ही तमगा दे सकती है। बीते चुनाव में राजद ने इस वर्ग को टिकट में पहले के मुकाबले ज्यादा हिस्सेदारी देने के बावजूद एमवाई की पार्टी की धारणा नहीं तोड़ पाई। इसका नतीजा यह निकला कि राजद की अगुवाई वाला विपक्षी महागठबंधन सत्ता की दहलीज पर आ कर फिसल गया।
इस चुनाव में एक बात तय है। परिणाम की पटकथा मुसलमान और यादव नहीं बल्कि एमबीसी लिखेंगे। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजग अपने इस वोट बैंक को साधे रखने और राजद इस वोट बैंक में बड़ा सेंध लगाने के लिए कौन सा सियासी दाव लगाती है? हालांकि राजद ने पहली बार प्रदेश संगठन की कमान एमबीसी से जुड़े मंगनी लाल मंडल को दे कर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। बीते चुनाव में राजद ने टिकट के मामले में इस वर्ग की हिस्सेदारी बढ़ाई थी। मगर आधे से अधिक टिकट मुसलमानों और यादवों में बांट देने के कारण एमबीसी में पैठ बनाने के मामले में राजद को आंशिक सफलता ही मिल पाई।
इस बार टिकट वितरण बेहद अहम
जाति की राजनीति के लिए कुख्यात बिहार में टिकट वितरण के बाद ही अलग-अलग वर्गों के किसी गठबंधन के समर्थन या विरोध की संभावना तलाशी जा सकती है। टिकट वितरण के मामले में राजद का जोर जहां मुसलमान-यादव बिरादरी पर रहता है, वहीं जदयू की रणनीति सभी वर्गों को संदेश देने की होती है। मसलन बीते चुनाव में राजद जिन 144 सीटों पर चुनाव लड़ी, उनमें यादवों और मुसलमानों को 77 टिकट बांटे। पार्टी ने पहली बार एमबीसी और एससी को 19-19, कुशवाहा को 8 और राजपूत बिरादरी को 9 टिकट बांटे। कुर्मी वर्ग से महज एक को उम्मीदवार बनाया। इसके उलट जदयू ने यादव बिरादरी से 18, एमबीसी से 17, एससी से 16, मुसलमान से 11, राजपूत से 7, कुशवाहा और कुर्मी से 15-15, भूमिहार से 10 और ब्राह्मण बिरादरी से तीन उम्मीदवार बनाए। राजद के मुकाबले टिकट वितरण में अधिक जातियों को तरजीह दी।
क्या रहा नतीजा?
टिकट वितरण में जातियों का दायरा बढ़ाने का लाभ राजद को मिला। यादव और मुसलमानों से जुड़ी 45 सीट जीतने के अलावा पार्टी को पांच राजपूत, नौ एससी, चार एमबीसी, छह कुशवाहा और तीन बनिया विधायक मिले। इसके उलट जदयू से यादव बिरादरी के सात, एमबीसी के 12, भूमिहार के 5, ब्राहमण के 2, एसी के 10 विधायक चुन कर आए। अगर जदयू के साथ लोजपा (आर) ने खेल नहीं किया होता तो तस्वीर दूसरी होती।
एमबीसी को साधना कितना मुश्किल?
राजद के लिए मुख्य चुनौती एमबीसी को साधने की है। यह राह इतनी आसान नहीं है। इसके लिए तेजस्वी को टिकट वितरण और पद के मामले में इस वर्ग का विशेष ख्याल रखना होगा। दरअसल एमबीसी में सैकड़ों जातियां हैं, जिनका कोई सियासी रसूख नहीं है। यह बिरादरी ताकतवर ओबीसी जातियों से बढ़ते रसूख से खौफ खाती हैं। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए नीतीश कुमार ने इस वर्ग के साथ ही महादलितों में पार्टी की पैठ बनाई। मोदी सरकार के जनकल्याण कार्यक्रमों से सर्वाधिक लाभान्वित होने के कारण इस वर्ग का एक हिस्सा भाजपा से भी जुड़ा। इसके कारण एम-वाई समीकरण के खिलाफ राजग का एमबीसी, महादलित और अगड़ा गठबंधन ज्यादा मजबूत हो गया।
तब भी बस एमवाई के सहारे सत्ता में नहीं थी राजद
राजद ने नब्बे के दशक के अंतिम दस और नई सदी के शुरुआती पांच साल तक राज्य की सियासत में अपना दमखम दिखाया। हालांकि तब भी इस पार्टी का मुख्य आधार जरूर एम-वाई समीकरण था, मगर उस दौरान एमबीसी और गैरयादव ओबीसी से जुड़ी कई नामचीन हस्तियों का राजद में रहने के कारण उसे चुनावी लाभ मिलता रहा। इस डेढ़ दशक के दौरान एमबीसी से जुड़े नेता राजद में किनारे होते चले गए। इसी बीच जब पहले समता पार्टी और बाद में जदयू के सहारे जब ओबीसी वर्ग के ही नीतीश कुमार सामने आए तो राजद लंबे समय तक मुकाबला नहीं कर पाई।



