नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) से जुड़ी एक नई रणनीतिक योजना (US Foreign Policy) को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चाएं तेज हो गई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप एक नए ‘कोर-5’ (Core-5 Group) या ‘हार्ड-पावर ग्रुप’ की अवधारणा पर विचार कर रहे हैं, जिसमें अमेरिका के साथ भारत, चीन, रूस और जापान को शामिल किया जा सकता है। माना जा रहा है कि यह प्रस्ताव मौजूदा यूरोप-केंद्रित वैश्विक समूहों जैसे जी-7 की भूमिका को सीमित कर सकता है और दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों का एक नया मंच तैयार कर सकता है।
क्या है ‘कोर-5’ का मकसद
इस कथित योजना का उद्देश्य उन देशों को एक साथ लाना है, जिनकी आबादी, सैन्य ताकत और आर्थिक प्रभाव वैश्विक स्तर पर निर्णायक माने जाते हैं। बताया जा रहा है कि ‘कोर-5’ में शामिल संभावित देशों की जनसंख्या 10 करोड़ से अधिक है और ये सभी किसी न किसी रूप में वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करते हैं। इस समूह के तहत जी-7 की तरह नियमित शिखर सम्मेलन आयोजित करने की बात कही गई है, जिनमें सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा होगी।
मध्य पूर्व पर विशेष फोकस
रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रस्तावित एजेंडा में सबसे पहले मध्य पूर्व की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। खासतौर पर इजरायल और सऊदी अरब के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने जैसे संवेदनशील विषयों पर बातचीत को अहम माना जा रहा है। अमेरिका लंबे समय से इस क्षेत्र में स्थिरता और अपने रणनीतिक हितों को मजबूत करने की कोशिश करता रहा है, ऐसे में ‘कोर-5’ मंच को इस दिशा में एक प्रभावी साधन माना जा रहा है।
व्हाइट हाउस का इनकार
हालांकि, इस पूरे मामले पर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। व्हाइट हाउस ने ऐसे किसी दस्तावेज के अस्तित्व से इनकार किया है। प्रेस सचिव हन्ना केली का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का केवल एक ही आधिकारिक संस्करण है और उसका कोई वैकल्पिक या गुप्त प्रारूप नहीं है। इसके बावजूद, अमेरिकी मीडिया संस्थानों का दावा है कि यह विचार राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के एक लंबे और अप्रकाशित संस्करण में सामने आया था।
ट्रंपवादी सोच की झलक
राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव ट्रंप की पारंपरिक विदेश नीति से मेल खाता है, जिसमें शक्ति और प्रभाव को प्राथमिकता दी जाती है। ट्रंप प्रशासन पहले भी यह संकेत देता रहा है कि मौजूदा वैश्विक संस्थाएं बहुध्रुवीय दुनिया की चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में सीमित लेकिन शक्तिशाली देशों के बीच सीधे समझौते उनकी रणनीति का हिस्सा रहे हैं।
वैश्विक मंचों पर असर की संभावना
यह चर्चा ऐसे समय पर सामने आई है, जब अमेरिका में यह बहस चल रही है कि ट्रंप का संभावित दूसरा कार्यकाल वैश्विक व्यवस्था में कितना बड़ा बदलाव ला सकता है। यदि ‘कोर-5’ जैसी पहल वास्तव में आगे बढ़ती है, तो जी-7 और जी-20 जैसे मंचों की भूमिका पर सवाल उठ सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कदम अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा दे सकता है, जहां ताकतवर देशों के बीच सीधी सहमति को ज्यादा महत्व मिलेगा।



