संसद का बदलता गणित: क्या एनडीए फिर लाएगा परिसीमन विधेयक?

मुख्य बिंदु: विपक्ष का बिखराव: टीएमसी, शिवसेना (UBT) और 'इंडिया' गठबंधन में टूट से एनडीए को नई संजीवनी मिली है। परिसीमन की वापसी: लोकसभा में 131वें संविधान संशोधन विधेयक के दोबारा पास होने की अटकलें तेज। राज्यसभा में दबदबा: एनडीए राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब। चुनौती बरकरार: दक्षिण भारतीय राज्यों और डीएमके का विरोध अब भी सरकार के लिए सबसे बड़ी बाधा।

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मुख्य बिंदु:

  • विपक्ष का बिखराव: टीएमसी, शिवसेना (UBT) और ‘इंडिया’ गठबंधन में टूट से एनडीए को नई संजीवनी मिली है।
  • परिसीमन की वापसी: लोकसभा में 131वें संविधान संशोधन विधेयक के दोबारा पास होने की अटकलें तेज।
  • राज्यसभा में दबदबा: एनडीए राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब।
  • चुनौती बरकरार: दक्षिण भारतीय राज्यों और डीएमके का विरोध अब भी सरकार के लिए सबसे बड़ी बाधा।

संसद में क्या एनडीए की बदली किस्मत?

अप्रैल 2026 में जब मोदी सरकार का महत्वाकांक्षी ‘संविधान (131वां संशोधन) विधेयक’ लोकसभा में गिरा था, तो इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल की पहली बड़ी संवैधानिक शिकस्त माना गया था। उस समय विपक्ष की एकजुटता ने सरकार को 54 वोटों के भारी अंतर से हरा दिया था। सदन में मौजूद 528 सांसदों में से सरकार को केवल 298 वोट मिल सके थे, जबकि दो-तिहाई बहुमत (362) की जरूरत थी।

लेकिन जून 2026 आते-आते स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। विपक्ष के खेमे में मची भगदड़ ने सरकार के लिए उन उम्मीदों के द्वार खोल दिए हैं, जो कुछ महीने पहले बंद नजर आ रहे थे।

विपक्ष का बिखराव: राज्यों से संसद तक असर

संसद के समीकरण बदलने के पीछे प्रमुख कारण क्षेत्रीय दलों में हो रही लगातार टूट है, जिसने विपक्ष के ‘इंडिया’ गठबंधन की कमर तोड़ दी है:

  1. टीएमसी (TMC) का बड़ा विस्फोट: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी में आंतरिक विद्रोह चरम पर है। लोकसभा में टीएमसी के 28 में से 20 सांसदों ने बागी तेवर अपनाते हुए एक अलग गुट बना लिया है। उन्होंने ‘नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI)’ में विलय की घोषणा की है और एनडीए को समर्थन देने का ऐलान किया है। राज्यसभा में भी सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बड़ाइक जैसे दिग्गज नेताओं के इस्तीफे से पार्टी नेतृत्व बैकफुट पर है।
  2. शिवसेना (UBT) का अस्तित्व संकट: महाराष्ट्र की राजनीति में उठापटक जारी है। उद्धव ठाकरे गुट के 9 लोकसभा सांसदों में से कम से कम 6 सांसदों ने एकनाथ शिंदे गुट के प्रति निष्ठा दिखाई है। पार्टी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर किसी भी विलय को मंजूरी न देने की गुहार लगाई है, जो उनकी बढ़ती हताशा को दर्शाता है।
  3. इंडिया ब्लॉक में दरार: तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके (DMK) का गठबंधन टूटना विपक्षी एकता के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ है। इस महीने की शुरुआत में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक से डीएमके की अनुपस्थिति ने स्पष्ट कर दिया है कि गठबंधन अब बिखर चुका है। साथ ही, आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों के भाजपा में शामिल होने से विपक्ष का राज्यसभा में संख्या बल काफी कम हो गया है।

लोकसभा का नया ‘गणित’ और परिसीमन विधेयक की चुनौतियां

परिसीमन विधेयक के माध्यम से सरकार लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। महिला आरक्षण को इस परिसीमन से जोड़कर इसे सरकार की बड़ी उपलब्धि बनाने की कोशिश की जा रही है।

  • एनडीए की वर्तमान ताकत: 293 सांसद।
  • बागी सांसदों का साथ: टीएमसी के 20 और शिवसेना के 6 सांसदों के जुड़ने से यह आंकड़ा 319 तक पहुँचता है।
  • गणित का फासला: हालाँकि यह आंकड़ा पहले से कहीं बेहतर है, लेकिन 362 (दो-तिहाई बहुमत) के जादुई आंकड़े तक पहुँचने के लिए अभी भी 43 सीटों की कमी है। अगर डीएमके के 22 सांसद समर्थन दे भी दें, तब भी सरकार बहुमत से 21 सीटें दूर रहेगी। ऐसे में वाईएसआरसीपी (YSRCP) के 4 सांसदों, निर्दलीयों और छोटे दलों की भूमिका निर्णायक होगी।

क्या है ‘बीच का रास्ता’? (संवैधानिक समाधान)

दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने से उनकी राजनीतिक ताकत कम हो जाएगी और उत्तर भारत का दबदबा बढ़ जाएगा। डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने तो विधेयक की प्रतियां जलाकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया था।

हालांकि, अब चर्चा है कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के सुझाव पर सरकार एक नया संशोधन ला सकती है। प्रस्ताव यह है कि सभी राज्यों में आनुपातिक रूप से 50% सीटों की वृद्धि की जाए, ताकि किसी भी राज्य की हिस्सेदारी का अनुपात न बिगड़े। ए. राजा (डीएमके) ने संकेत दिया है कि अगर वे इंडिया गठबंधन से बाहर हैं, तो भी वे भाजपा के एजेंडे को तब तक नहीं स्वीकारेंगे जब तक कि दक्षिण के हितों की रक्षा न हो।

राज्यसभा: जहाँ एनडीए का दबदबा स्पष्ट है

लोकसभा के उलट राज्यसभा में एनडीए ऐतिहासिक मजबूती के साथ खड़ा है।

  • भाजपा के पास 114 सीटें हैं।
  • झारखंड और बंगाल की सीटों पर जीत के बाद एनडीए का आंकड़ा 155 तक पहुँचने की संभावना है।
  • विपक्ष, जो पहले मजबूत स्थिति में था, अब घटकर 63 सीटों पर सिमट गया है।

निष्कर्ष

संसद में विपक्ष का बिखराव एनडीए के लिए एक स्वर्णिम अवसर लेकर आया है। जहां एक ओर संख्या बल सरकार के पक्ष में झुक रहा है, वहीं दूसरी ओर संघीय ढांचे और दक्षिण बनाम उत्तर के राजनीतिक संतुलन को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। आने वाले मानसून सत्र में यह विधेयक भारतीय लोकतंत्र की दिशा और दशा दोनों तय करेगा। क्या प्रधानमंत्री मोदी इस बार अपनी संवैधानिक हार को जीत में बदल पाएंगे?

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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